मधुमेह और दुबलापन



दुबले भी हो सकते है मधुमेह के शिकार

ऐसा भी होता है...
हाल में सम्पन्न हुए एक डायबिटीज कैम्प में एक मरीज का ब्लड सुगर ग्लुकोमीटर हाई दिखा रहा था। यानी ग्लुकोमीटर की क्षमता के ऊपर उसका बल्डसुगर रहने से सुगर की निश्चित मात्रा अंकित नहीं हो पा रही थी। मरीज देखने में बिल्कुल दुबला-पतला था। उसकी उम्र 35साल के करीब थी। वह होमियोपैथिक इलाज में था। उसे दिलासा दिया गया था कि वह इस इलाज से पूर्णतः ठीक हो जायेगा। साथ में वह मेथी एवं जामुन का भी प्रयोग कर रहा था। जब ग्लुकोमीटर में इस मरीज का बल्डसुगर अंकित नहीं हुआ तब उसके बल्डसुगर की जांच लेबोरेट्री में कम्प्यूटर पर की गयी। उसका बल्डसुगर 631 मि.ग्रा. आया।


यह सोचना कि डायबिटीज का रिस्ता केवल मोटे लोगों के साथ है, एक भूल है।

इस केस में कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपे हुए हैं।पहली बात यह है कि यह सोचना कि डायबिटीज का रिस्ता केवल मोटे लोगों के साथ है, एक भूल है। बिलकुल मरियल से दिखने वाले दुबले लोगों में भी भारत में डायबिटीज का मिलना आम घटना है। इसे चिकित्सीय भाषा में लीन टाइप- टू बीमारी कहते हैं। इसलिए दुबले-पतले लोगों में भी ज्यादा पेशाब होने, ज्यादा भूख लगने, ज्यादा प्यास लगने के लक्षण हों तो तुरंत ब्लडसुगर की जांच होनी चाहिए। ऐसे मरीजों में ब्लडसुगर के अत्यधिक बढ़ जाने से बेहोशी की समस्या बार-बार सामने आती है। और बेहोशी की हालत में ही बीमारी कई बार पकड़ में आती है। मरीज का 500 या 600 सुगर के साथ चलते-फिरते रहना कई बार भ्रम पैदा करता है। कई मरीजों का शरीर इतने सुगर के साथ तालमेल की स्थिति में रहता है मगर डायबिटीक कोमा में जाने का खतरा बरकरार रहता है। इतना ब्लड सुगर इस बात के लिए सतर्क करता है कि तुरंत इन्सुलीन की सूई शुरू की जाये। ऐसे ज्यादातर मरीज बिना इन्सुलीन के ठीक नहीं किये जा सकते। इन मरीजों में साधारणतया इन्सुलीन की मात्रा बहुत ज्यादा लगती है। इनको इन्सुलीन देना हर हाल में जरूरी होता है। इन्सुलीन की सुई के भय से कई लोग इन्सुलीन से परहेज करते हैं। वे यह भी सोचते हैं कि एक बार सूई लेने से उन्हें इन्सुलीन की आदत पड़ जायेगी। यह गलत सोच उन्हें अन्य पैथियों की ओर मोड़ देता है। मगर मेरे अनुभव में उन पैथियों के पास कोई भी ठोस चिकित्सा उपलब्ध नहीं है।


लीन टाइप -टू डायबिटीज के मरीज इन्सुलीन लेने में आनाकानी न करें तो यह उनके लिए शुभ है।

पतले-दुबले कम उम्र के डायबिटीज के रोगियों में यदि बीमारी गंभीर नहीं हो तो खाने वाली गोलियों से भी काम चल जाता है। यह आकलन चिकित्सक ही कर सकते हैं कि किस मरीज को दवा पर रखना है और किसको इन्सुलीन पर। इन्सुलीन लेने के नाम पर मन में भय पैदा करने की जरूरत नहीं है। इन्सुलीन लेने की तकनीक में अभूतपूर्व विकास हुआ है। इन्सुलीन पेन की नयी तकनीक द्वारा इन्सुलीन की सूई लेना बच्चों का खेल हो गया है। इसकी सूई भी इतनी पतली है कि दर्द का एहसास नहीं होता। बस इन्सुलीन की निर्धारित मात्रा डयल करें और बटन दबाये। इन्सुलीन पेन को कमरे के तापमान पर महीने भर रखा जा सकता है। इन्सुलीन एक नये रसायन के साथ नोवो फलैक्स पेन भी अब उपलब्ध है। इस इन्सुलीन के साथ झंझट नहीं है कि खाने के आधे घंटे पहले सूई ली जाये। इसे ठीक खाने के समय भी लिया जा सकता है। तकनीक तो उपलब्ध है किन्तु इन्सुलीन का खर्च वहन करना गरीब मरीज के बस में नहीं है जो एक सच्चाई है। ऐसे मरीज चाहें तो पुरानी तकनीक द्वारा अपेक्षाकृत कम शुद्ध इन्सुलीन की दूसरी वेराइटी ले सकते हैं जो सस्ती है। इन्सुलीन का टैबलेट अभी प्रयोगात्मक दौर में है। निकट भविष्य में बाजार में इन्सुलीन टैबलेट के आने की संभावना नहीं है। एक्जुबरा नाम से उपलब्ध इन्सुलीन के इन्हेलेशन तकनीक को सुरक्षित एवं पूर्णतः असरदार पाया गया है। सांस द्वारा इस तरह इन्सुलीन देना अभी काफी मंहगा है। मगर यह एक नयी आशा है। लीन टाइप -टू डायबिटीज के मरीज इन्सुलीन लेने में आनाकानी न करें तो यह उनके लिए शुभ है।