मधुमेह - बचाव



अगर घर में माँ-बाप में किसी को डायबिटीज है तो अपने बच्चों को जरूर पढने के लिए प्रेरित करें इन पन्नों को - मधुमेह - बचाव संभव है

रिस्क मधुमेह होने का :
20% - घर में किसी एक को हो
40% - माँ-बाप में किसी एक को बीमारी हो
70% - एक को बीमारी हो, दुसरा डायबेटिक फैमली से हो
99% - माँ-बाप दोनो को हो


यह है इस शताब्दी का सबसे बङा समाचार

मधुमेह की मेहरबानी आज भारतीय समाज को जिस अभिशाप से कुंठित और जर्जर कर रही है, उससे निकलने के लिए समस्या की तह तक जाना होगा। मधुमेह नई बीमारी नहीं है, यह सही है। सुश्रुत संहिता में मधुमेह के दो प्रकारों का विवरण है, एक जो अनुवांशिक कारणों से होता है तथा दूसरा जो अवैज्ञानिक खानपान और रहन सहन से होता है। हृदय आघात स्ट्रोक आदि कई खतरनाक बीमारीयों का इसे जनक माना जाता है। इस बीमारी की जकड़ आज जिस तबाही को इंगित कर रही है, इससे क्या बचा जा सकता है यह प्रश्न चिकित्सा जगत में काफी प्रमुखता से उठाया गया है। क्या बीमारी के चंगुल में आकर उच्च रक्तचाप, एनजाइना, स्ट्रोक आदि को झेलना आधुनिकता की निशानी है या कोई सम्भावना है-हम नकार सकें, हम बच सकें, इस बीमारी को टाल सकें।


आंकड़ों में उत्तर

1979 में किये गये सर्वेक्षण से (आई सी एम आर- आहूजा) भारत में पहली बार-प्रमाणिक तथ्य इस बीमारी की व्यापकता के बारे में मिले। इसके बाद यह पाया गया कि वैसे भारतीय जो विकसित देशों में जा बसे उनमें मधुमेह की व्यापकता ज्यादा पायी गयी है। इसके बाद यह सोचा जाने लगा कि क्या मधुमेह होने की दर गांव और शहरी लोगों में एक ही है या अलग।

नवीनतम सर्वेक्षण केवल चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि दहशत और उदासी पैदा करने वाले हैं। देहाती क्षेत्रों में बीमारी की व्यापकता-दर जबिक 1 प्रतिशत है, शहरी क्षेत्रों में यह 2 प्रतिशत से बढ़कर 8 से 30 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। मद्रास में 1992 में हुए सर्वेक्षण में रामचन्द्रन ने बीमारी की व्यापकता दर देहाती क्षेत्रों में 2.4 प्रतिशत पाया जबकि इसी इथनिक समुदाय के लोगों में शहरी क्षेत्रों में 8.2 प्रतिशत। सन 2001 के सर्वेक्षण में यह आंकड़ा शहरों में 13.9 प्रतिशत एवं गांवों में 4.2 प्रतिशत हो गया है।

इस अन्तर का कारण जीवन में निहित कुछ खास तथ्य ही हो सकते हैं। शहरी जीवन में अधिक तनाव, व्यायाम का अभाव, शिथिलता, ऐसा भोजन जिसमें सेचुरेटेड फैट ज्यादा है, अधिक मात्रा में ग्लुकोज वाली चीजें खाना, रिफाईन्ड तेलों का सेवन, फाइवर रहित भोजन आदि की प्रचुरता है। इसी तरह शहरी लोगों में सौफ्टड्रिंक, मिठाईयां, स्नैक्स आदि भोज्य पदार्थों की प्रचुरता है जिसमें फैट और सुगर ज्यादा है। इन अन्तरों के कारण यदि देहाती और शहरी दर में फर्क है तो इन्हीं चीजों पर ध्यान देकर मधुमेह से बचने की संभावना प्रबल है।

बीमारी होने के पहले ही कुछ खास आदतों को अपना कर स्वस्थ रहा जा सकता है। बचपन से ही नियमित व्यायाम और खाने की चीजों पर ध्यान देकर जैसे संतुलित प्रोटीन, फाइवर युक्त पदार्थ, मिठाईयां और तलीय पदार्थों से बचना तथा संतुलित शारीरिक वजन को अपनाना आवश्यक है। अधिक मात्रा में ग्लुकोज वाली चीजों का सेवन धीरे-धीरे अग्नाशय (पैनक्रियाज) के बीटा कोशिकाओं को नाकाम कर देता है। समाज के कुछ खास वर्ग हाई रिस्क ग्रुप में आते है, जिनमें इस बीमारी के होने की प्रबल सम्भावना है। जैसे घर में माँ या पिता का बीमारी से पीड़ित रहना, वैसे बच्चे जिनका वजन जन्म के समय आठ पौण्ड से ज्यादा हो, मोटे लोग तथा कम उम्र के लोगों में एनजाइना आदि का होना। ऐसे हाई रिस्क ग्रुप के लोगों को विशेष तौर से सतर्क रहनें की जरूरत है। उन्हें डेकाड्रान ग्रुप की दवाएं, फैमली प्लानिंग की गोली, अलकोहल आदि से बच कर रहना है। अपने ब्लड कोलेस्टरोल और ट्रागलाइसेराइड को ठीक रखें, रक्तचाप को सही रखें तथा वजन संतुलित करें। कम से कम चार किलोमीटर रोज पैदल चलें। इस सलाह के परिणाम बहुत व्यापक और सुखद होंगे।

टाइप- वन मधुमेह जो किशोरावस्था के समय होता है, उसमें सम्भवतः किसी वाइरल इन्फेक्शन से बीटा सेल नष्ट हो जाते हैं, जेनेटिक कानसेलिंग का कुछ ज्यादा महत्व नहीं है। कुछ खास केसों में आइजलेट सेल एन्टीबॉडी को रक्त में पाकर साइकलोसेरीन ग्रुप की दवाएं देने के असर को अभी परखा जा रहा है।


द्वितीयक निवारण

बीमारी का जितना जल्दी हो पता करना, इसके प्रोग्रेस को रोकना, और बीमारी से होनेवाले खतरों को स्थगित करना द्वितीयक निवारण में आते हैं। हाई रिस्क ग्रुप के लोगों में तीस के बाद हर साल कम से कम एक बार रक्त शर्करा की जांच आवश्यक है। जो लोग सामाम्न्य ग्रुप के हैं उन्हें भी रक्तशर्करा की जांच साल में एक बार करवा लेना चाहिए। स्मरण रखें, रक्त शर्करा सामान्य रखकर आप इसके खतरनाक दुष्पिरणामों को टाल सकते है।

जिन्हें बीमारी हो चुकी है, उन्हें खान-पान का पूरा संयम रखना जरूरी है। किन्तु व्यवहार में लोग महीनों बिना जांच के दवाइयाँ खाते रहते है, जो पूर्णतः अवैज्ञानिक है। दुख का विषय यह है कि भारत में मधुमेह के बारे में उचित हेल्थ ऐजुकेशन का आभाव है। जबकि मधुमेह कन्ट्रोल में इससे मह्तवपूर्ण कुछ है ही नहीं। यह ऐसी बीमारी जिसके बारे में रोगी की जानकारी बहुत मायने रखती है। थोङी सी भुल-चुक हुई कि फंसे। मसलन दवा खाते हुए उपवास या ज्यादा शारीरिक मेहनत की तो रक्तशर्करा काफी कम होने से बेहोशी हो सकती है। रक्तशर्करा कमने लगे तो बैचैनी, घबराहट, पसीना आने की शिकायत, कम्पन आदि होने लगता है। रोगी को पता होना चाहिए कि किस समय तुरंत ग्लुकोज, मधु या शरबत आदि ले लें। इसी तरह पैरों की सुरक्षा,आंखो की जांच और किडनी रोग के लिए माईक्रो अलबुमिनुरिया की जांच आदि के बारे में अपने चिकित्सक से पूरी जानकारी ले लें।


साराशं-

1. मधुमेह से बचने के लिए पूर्णतः प्राकृतिक जीवन जीना होगा, यह संदेश देहाती और शहरी क्षेत्रों में मधुमेह की व्यापकता दर के अन्तर से ध्वनित होता है।

2. मधुमेह के रोगियों को सही जानकारी और सही दिशा निर्देश की जरूरत है, जिस पर चलकर वे मधुमेह के खतरनाक परिणामों से बच सकते हैं।


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