इन्सुलीन - तकनीक का कमाल



इन्सुलीन लेते-लेते लव हो जाए

मधुमेह के रोगियों को यदि इन्सुलीन की सूई लेने की सलाह दी जाती है तो अकसर उन्हे पसीना आने लगता है मानों मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा हो।मगर अब इन्सुलीन लेना इतना सरल हो गया है,मानों बच्चों का खेल हो।न तो कम्पाउन्डर के आने की जरुरत,न तो सूई के कारण दर्द होने की कसमसाहट -बस कलम-नुमे इस औजार को उठाइये,इन्सुलीन की मात्रा को डायल किजिये, स्पिरिट से चमड़े को साफ कर उठाइये, औजार के ऊपर के बटन को दबा दीजिये । कम खत्म ।

ज्यादा पीड़ा से कम पीड़ा की ओर प्रयास

थोडी चर्चा आइये कर लें इन्सुलीन के बारे में।बैंटिग और वेस्ट द्वारा इन्सुलीन की खोज मानव इतिहास में मधुमेह पर विजय की अमर गाथा है। तब से शुद्ध से शुद्धतम की ओर, ज्यादा पीड़ा से कम पीड़ा की ओर प्रयास जारी है। सबसे पहले वोभाइन इन्सुलीन बैलों के अग्नाशय(पैनक्रीयाज) से प्राप्त किया गया। फिर पोरसीन इन्सुलीन सुअर के अग्नाशय से निकाला गया। अन्ततः शुद्धतम तौर पर ह्युमन इन्सुलीन अब उपलब्ध है। मगर घबराइए मत बैलों और सुअरों को बड़ी मात्रा में मारकर इन्सुलीन बनाने का तरीका ह्युमन इन्सुलीन बनाने में इस्तेमाल नहीं होता। जेनेटिक इंजीनियरिंग डी.एन.ए. रीकोम्बीनेट तकनीक का इस्तेमाल कर बनाते हैं।


थेथर हो हो जाए जब बीटा सेल्स तब टेबलेट पर टेबलेट खाते जाइये कुछ नहीं होगा।

मधुमेह, जो कई खतरनाक रोगों की जड़ माना जाता है, महामारी के तौर पर इस देश में फैल रहा है। देश के लोग निठल्ले, बैठे ठाले चुपचाप दूरदर्शन देखने के आदि तो हो ही चुके है, बैठकर रिफाइन्ड सुगर एवं तली हुई चीजों को खाने के शौकीन हो गए हैं। सौगात में मिल रही है यह बीमारी। जो मधुमेह 40 साल के आस-पास हो उसे टाइप 2(टू) मधुमेह कहते हैं।देश के 95%-98%रोगी इसी प्रकार के हैं।बचपन में होने वाले मधुमेह को टाइप 1(वन)कहते हैं।मुख्य बात है कि टाइप वन में पैनक्रीयाज में इन्सुलिन स्त्रावित करने वाली बीटा कोशिकाएं पूर्णतः बरबाद हो जाती हैं।ऐसे मरीजों को बिना इन्सुलीन की सूई के कोई दूसरा चारा नहीं हैं।टाइप 2 में बीटा कोशिकाए कुछ- कुछ बची रहती है और दवाइयों द्वारा उन्हें झकझोर कर इन्सुलिन स्त्रावित करने को बाध्य किया जाता है ।मगर इस तरह बीटा कोशिकाओं को झकझोरने की भी एक सीमा होती हैं।एक समय आता है जब वह थेथर हो जाता है और तब टेबलेट पर टेबलेट खाते जाइये कुछ नहीं होगा। आपका ब्लड सुगर हमेशा उच्च रहेगा।

टाइप टू के मरीजों को भी इन्सुलीन की थोड़ी बहुत जरुरत पड़ेगी

हाल में दुनिया में हुए डी सी सी टी ट्रायल और यू के पी डी ट्रायल के नतीजे कह रहे है कि हर हाल में ब्लड सुगर ठीक रखिये, यदि खतरनाक कम्पलीकेशनों से बचना है। इस तरह टाइप टू के मरीजों को भी इन्सुलीन की थोड़ी बहुत जरुरत पड़ेगी। मगर सुई के डर से इन्सुलीन लेने को लोग राजी नहीं होते हैं। यह भ्रम भी न रखें कि एक बार इन्सुलीन शुरु कर देने पर जिन्दगी भर इन्सुलीन लेनी होगी। हो सकता है, कुछ दिन का इन्सुलीन आपको ज्यादा सबल और सुखी बनाए। इन्सुलीन से वजन इजाफे होने का डर, इन्सुलीन रेसीसटेन्ट की अवस्था, इन्सुलीन द्वारा थक्के बनने का डर,इन्सुलीन द्वारा ब्लड सुगर जरुरत से ज्यादा कमने का डर आदि कई समस्याओं और भ्रमजालों में आपको पड़ने की जरुरत नहीं।

यदि चिकित्सक ने इन्सुलीन लेने को कहा है तो अवश्य शुरु कीजिए।
अरटिफिशियल पैनक्रियाज अब उपयोग के लिए तैयार है

हाल में [जून 2009]अमेरिकन डायबिटीज एशोसिएशन के सम्मेलन में अरटिफिशियल पैनक्रियाज की उपयोगिता पर क्लिनिकल ट्रायल पेश किया गया।इस सिस्टम में एक इन्सुलीन पंप के साथ सेन्सर होता है जो एक लैपटाँप से जुङा होता है। लैपटाँप में विशेष सोफ्टवेयर प्रोग्रामिंग होता है जिसे शोधकर्ताओं ने अरटिफिशियल पैनक्रियाज का नाम दिया है। मशीन में लगा सेन्सर हर 5 मिनट पर स्वत: रक्त सुगर की जाँच करके स्वत: इन्सुलिन की मात्रा निर्धारित करके उसे शरीर में छोङ देता है।इजराईल के एक मेडिकल सेन्टर में 4 टाईप -वन रोगियों पर इस सिस्टम का ईस्तेमाल किया जा रहा है।इस सिस्टम का फायदा यह है कि उम्दा ढंग से रक्त सुगर का नियन्त्रण होता है और हाइपोग्लायसिमिया होने का भी डर नहीं रहता।। मगर चमङे में इन्फेक्शन का डर भी बना रहता है।यह सिस्टम इतना मँहगा और दुरूह है कि शायद ही कभी लोकप्रिय हो।

क्या है नोवोपेन-तीन विधि

इन्सुलीन दिन में दो बार लेना हो या पांच बार, बड़ी सरलता से मरीज स्वयं बिना दर्द के (लगभग) नोवोपेन द्वारा ले सकता है। जान आयरलैंड ने पहली बार इस तरीके की सूत्रपात की। सबसे पहले इजाद हुई नोवोपेन (एक), जिससे एक बार में मात्र दो यूनिट इन्सुलीन देना सम्भव था। फिर इजाद हुई नोवेपन दो, इसमें डायल द्वारा इन्सुलीन की यूनिट मात्रा निर्धारित की जा सकती थी -अधिकम सीमा 36 यूनिट तक, दो-दो के अन्तराल पर। इसका उपयोग थोड़ा जटिल था। इसमें हर तरह के इन्सुलीन के उपयोग की भी व्यवस्था नहीं थी। भारत में उचित जागरण के अभाव में नोवोपेन दो लोकप्रिय नहीं हो सका, यद्यपि दुनिया के कई विकसित देशों में सत्तर से नब्बे प्रतिशत लोग इसका उपयोग करते रहे।


मगर नोवोपेन दो को जाइए भूल। मधुमेह की चिकित्सा में आ गई है नोवोपेन-तीन एंव चार। इन्सुलीन लेना इतना सरल कभी नहीं था। मेरी दृष्टि में यह क्रान्तिकारी ईजाद है।
पेन की तरह का है। इसे पाकेट में रखकर घूम सकते हैं। यात्रा में ले जा सकते हैं। बस नॉब घुमाकर इन्सुलीन की मात्रा डायल करें और ऊपर में स्थित बटन को दाबें। विशेषताएं -


(1) मेटलिक बाडी होने से यह जिन्दगी भर साथ निभाएगा
(2) इनमें जीरो से लेकर सत्तर यूनिट तक इन्सुलीन एक बार में ली जा सकती है।
(3) इन्सुलीन की कोई भी मात्रा एक के अन्तराल पर निर्धारित की जा सकती है।
(4) इनमें इन्सुलीन की कोई भी मात्रा नष्ट नहीं होती है।
(5) इसमें तीन तरह के इन्सुलीन प्रयोग में लाये जा सकते हैं। बाजार में इसे पेनफील नाम से जानते हैं, मिक्सटाई एचएम पेनफील एवं इनसुलाटार्ड एचएम पेन पेनफईल (एक पेनफील की कीमत 250 रुपये के आस पास)
(6) इसमें नोवोपेन सूई अट्ठाइस गेज की लगाई जाती है। एक का दाम 7-10रूपया। एक डीसपोजेबल सूई से पन्द्रह से बीस बार सूई दे सकते हैं।
(7) नोवोपेन (तीन) सेट का दाम 700-1000 रुपये है। यह हमेशा के लिए है।
(8) अतिसूक्ष्म सूई होने से दर्द नहीं के बराबर होता है, एक बच्चा भी इसे आसानी से ले सकता है।


इन्सुलीन देने की यह आधुनिकतम एवं विकिसत तकनीक शायद चिकित्सा प्रणाली में मील का पत्थर साबित हो, इसकी जानकारी मधुमेह के रोगियों के लिए जरूरी है.


नोवोलेट
पेन की शक्ल का यह यंन्त्र अब आसानी से उपलब्ध हो चुका है। इससे इन्सुलीन लेना और आसान हो गया है। इसमें पहले से ही इन्सुलीन भरा रहता है। तत्काल इस्तेमाल कीजिए और खत्म होने पर इस फेंक दीजिए। 325 रुपया में यह उपलब्ध है। जिसमें विभिन्न प्रकार के इन्सुलीन इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

फ्लेक्स पेन (नोभेमिक्स)
इन्सुलीन एनालॉग है। जो कापी प्रभावी है जो खाने के तुरंत पहले दिया जा सकता है।डिसपोजेबल पेन नोवोमिक्स करीब 800 रूपये में आता है।

लेन्टस आपटोसेट
यह इन्सुलीन ग्लारजीन के साथ है।

इली लिलि ,श्रेया ,वोसुलीन पेन आदि कई कम्पनियों के पेन बाजार में उपलब्ध है।