डायबिटीज के अनमोल टिप्स


टिप्स जानिए,मजा कीजिए

प्रस्तुत है डा.एन.के.सिंह द्वारा लिखित मशहुर अखबारों में छपे उपयोगी 52 टिप्स...


01. डायट चार्ट एक फालतू झमेला
डायबिटीज के मरीजों को डायट चार्ट दिया जाता है, वह व्यवहार में बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं होता है।इन डायट चार्ट में कैलोरी का निर्धारण कर खाने वाली चीजों की निश्चित मात्रा बतायी जाती है।किसी भी मरीज के लिए माप-तौल कर उतनी मात्रा रोज लेना संभव नहीं है।यही कारण है कि ज्यादातर मरीज डायट चार्ट को बाद में रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं।सरल बात तो यह है कि जो खाना आप अब तक खाते रहें हैं वही बीमारी के बाद भी खाना है,बस कुछ परहेज करते हुए। मीठी चीजों से परहेज करें और ओवर इटिंग न करें। चावल,रोटी,सब्जी,दूध,मछली,चिकेन,माँस,गाजर,मूली,आलू,ताजे फल,बादाम,प्याज,लहसुन आदि डायबिटीज के मरीज निश्चिंत हो कर खा सकते हैं।हर आदमी के खाने की स्टाइल अलग होती है।इसलिए उसे एक निश्चित बंधन में बाँधना उचित नही।
02. डायबिटीक नेफ्ररोफैथी का मतलब किडनी खराब नही
अगर आपके चिकत्सक ने यह कहा है कि आपको डायबिटीज के कारण किडनी प्रभावित हो गयी है और डायबिटीक नेफ्ररोफैथी की समस्या शुरू हो गयी है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपकी किडनी खराब हो गयी है। डायबिटकी नेफ्ररोफैती के शुरुआती दौर में मरीज को कोई खास दिक्कत नहीं होती है। किडनी का कार्य 80 प्रतिशत से ज्यादा खराब हो जाये तभी लक्षण शुरू होते हैं। उस समय पैरों का फूलना, थकावट, उल्टी लगना, भूख न लगना जैसे लक्षण शुरू हो जाते हैं। आजकल हर डायबिटीज मरीज में साल में कम से कम एक बार माईक्रल टेस्ट कराकर माइक्रो अल्बुमिनुरिया पॉजीटीव है या नहीं, यह जानना जरूरी है। माइक्रल टेस्ट का पॉजीटीव होना केवल यह बताता है कि डायबिटीज द्वारा किनडनी पर प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। यह किडनी के फेल होने की अवस्था नहीं है। यदि इस समय बचाव के रास्तों पर चला जाये तो भविष्य में किडनी की खराबी को रोकना संभव है।
03. अपना ही सुगर है तो रखिए अपना ग्लुकोमीटर
डायबिटीज में सेल्फ मानीटरिंग आफ ब्लड शुगर यानि एमएमबीजी काफी महत्वपूर्ण हो गया है। भारत में बहुत कम मरीजों ने इसे अपनाया है। इस कान्सेप्ट के तहत ग्लुकोमीटर द्वारा स्वयं ब्लड शुगर देख कर दवा मात्रा निर्धारित की जा सकती है। इस तकनीक के तहत ज्यादा मात्रा में दवा के कारण हाईपोग्लायसिमिया होने का खतरा टल जाता है। यह सही है कि ग्लुकोमीटर की रीडिंग कभी-कभी सही नहीं होती। मगर फिर भी एक सही आईडिया मिल जाता है। ग्लुकोमीटर को ठीक से कैलीब्रेशन करके एवं सही तकनीक से ब्लड को स्ट्रीप कर देने से एसएमबीजी की खामी कम हो जाती है। भारत में पांच प्रतिशत से भी कम मरीज इसका इस्तेमाल करते हैं। विदेशों में इस तकनीक से मरीजों को ब्लड शुगर सही रखने में काफी मदद मिली है। हर मरीज अपना ग्लुकोमीटर रखे, इसकी जागरूकता आवश्यक है।
04. नो प्रोबलेम, चावल खाइए
डायबिटीज में कार्बोहाईड्रेट की मात्रा 60 से 65 प्रतिशत तक होनी चाहिए। यह चावल, रोटी व दाल से पूरा हो जाता है। शोधों द्वारा यह साबित हो चुका है कि चावल डायबिटीज मरीजों को दिया जा सकता है। चावल का ग्लायसिमिक इन्डेक्स भी बहुत ज्यादा नहीं होता है। यदि चावल को प्राकृतिक स्वरूप में खाया जाये तो इसका फाइबर डायबिटीज में विशेष फायदा पहुंचाता है। शुरूआती दौर में चावल लेने से मनाही की जाती थी लेकिन यह मात्र भ्रम साबित हुआ और अब कोई भी डायबिटीज मरीज आसानी से चावल खाकर स्वस्थ्य रह सकता है। इसकी कितनी मात्रा प्रतिदिन लेनी चाहिए, इसके लिए डाक्टर से सलाह आवश्यक है। डाक्टर के सलाह का अनुसरण करने पर मरीज को खतरा नही रहता।
05. डायबिटीज है जीवन भर का साथी मगर इससे क्या घबङाना
डायबिटीज का पूर्ण उपचार नहीं है। यह जीवन भर साथ रहने वाली बीमारी है। आयुर्वेदिक दवाएं थोड़ा बहुत ब्लड सुगर को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी है लेकिन जब डायबिटीज बढ जाये तो इसका उपचार एलोपैथ से ही हो सकता है। ज्यादा सुगर बढ़ने पर डायबिटीज कोमा में जाने का खतरा रहता है। योग एवं प्राणायाम से पैनक्रियाज के बीटा कोशिकाओं में ज्यादा रक्त प्रवाह होता और उनमें इंसुलिन तैयार करने की क्षमता बढ़ जाती है। दवा के साथ योग और प्राणायाम बेहद आवश्यक है। इससे डायबिटीज रोकने में मदद मिलती है। इस रोग के वैसे रोगी जिन्हें बीमारी की अवस्था कम है केवल भोजन पर नियंत्रण और व्यायाम तथा योग का सहारा लेकर डायबिटीज को काबू में रख सकते हैं। इन्हें किसी तरह की दवा खाने की जरूरत नहीं।
06. पार्टी में जा रहें तो जाइए,मगर....
डायबिटीज के मरीज जब किसी पार्टी में जाएं तो उन्हें कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि आप इंसुलिन ले रहे हो तो पार्टी में जाने के पहले सुई ले लें। ध्यान रखें आपको खाना आधे घण्टे के अंदर मिल जाए। इस मौके पर यह ध्यान रखे कि खाने में तैलीय पदार्थ, क्रीम, जैम या जेली आदि न डाले गए हो। सलाद, रायता, दाल जैसी सुरक्षित चीजें ही लें। मिठाई व पेस्ट्री नही ले। ड्रिक्सं में भी सावधानी बरते। चाय या काफी से काम चला लें। आजकल की पार्टियों में खाने के कई आईटम होते हैं। उनमें से सिर्फ उन्ही खाद्य पदार्थो को चुने जो आपके डायबिटीक आहार का हिस्सा हो। खतरनाक खाद्य पदार्थो को देखते हुए निकल जायें। यदि खाने में देरी हो रही हो और आपको चीनी कम होने के लक्षण लगे तो बिना संकोच के कुछ खाने की चीजें मांग लें।
07. स्वीट लाइफ को स्वीट बनाइए
चाय, काफी या मिठाई में चीनी की जगह कृत्रिम मीठे टैबलेट डायबिटीज रोगियों के लिए उपलब्ध है। इस ग्रुप में सेकारिन सबसे पुराना है इसके सुरक्षात्मक पहलुओं पर प्रश्न चिन्ह लगता रहा है। मगर पिछले 20 साल के शोधों के अनुसार इसके लगातार प्रयोग से पेशाब की थैली में कैंसर होने का कोई खतरा नहीं रहता। इसे गर्भावस्था में नहीं लेना चाहिए। एसपारटेम ज्यादा सुरक्षित एवं मीठा पदार्थ है लेकिन इसके एक ग्राम में चार कैलोरी होती है। इसका ध्यान रखते हुए कम मात्रा में इसे लिया जा सकता है लेकिन गर्भावस्था में इसे भी नहीं लेना चाहिए। सुक्ररालोज अपेक्षाकृत नया रसायन है और यह सुक्रोज से छह सौ गुणा ज्यादा मीठा होता है। इसका इस्तेमाल गर्भावस्था के दौरान भी किया जा सकता है। स्तनपान कराने वाली माताओं व बच्चों में भी इसका इस्तेमाल कराया जा सकता है। बाजार में यह जीरो या ईलाटा नाम से मिलता है।
08. करो व्यायाम नहीं तो होगे नाकाम
डायबिटीज के मरीज को अलग से व्यायाम के लिए चिकित्सक को सलाह देनी चाहिए। मरीजों को यह समझना चाहिए कि बिना पर्याप्त व्यायाम के शरीर में इंसुलिन की नाकामी को दूर नहीं किया जा सकता। शरीर में ग्लुकोज इंसुलिन रिसेप्टर के द्वारा ही कोशिका में घुस कर उर्जा पैदा करता है। व्यायाम द्वारा ही नाकाम इंसुलिन सही से काम करने लगता है वह मासंपेशियों में भी इंसुलिन रिसेप्टर की संख्या भी बढ़ जाती है। जो लोग समय की कमी का बहाना बनाकर रोज व्यायाम नहीं कर पाते उन्हें यह समझना चाहिए कि जब उनका शरीर ठीक रहेगा तभी वे बेहतर काम कर सकते है। जो मरीज नियमित रूप से व्यायाम नहीं कर पाते उनके शरीर में धीरे-धीरे दवाईयां नाकाम होने लगती है।
09. गैस नही यह डायबिटीज का कहर है
डायबिटीज का पेट व आंतों की कार्यप्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। यह तभी होता है जब ब्लड शुगर ठीक से नियंत्रित नहीं रहता। इसे डायबिटीक गैस्ट्रोपैथी कहते हैं। ऐसे मरीजों को बार बार ढकार आना, कब्ज रहना, डायरिया हो जाना, पेट का फूलना, ज्यादा गैस होना, पेट में जलन आदि की शिकायत होती है। यह आटोनामिक नर्वस सिस्टम की खराबी से होती है। इससे निजात पाने के लिए पहले तो अल्ट्रा साउण्ड एवं इन्डोस्कापी करा कर कोई दूसरा कारण है कि नहीं जानना चाहिए। यदि डायबिटीक गैस्ट्रोपैथी का निदान किया जाता है तो सर्वप्रथम ब्लड शुगर का नियंत्रण जरूरी है। इटोप्राइड व मोजाप्राइड नाम की दवाएं इस समस्या से निजात दिला सकते है।
10. तौबा -तौबा,किसने कहा जमीन के नीचे की चीजें न खाएँ
डायबिटीज के मरीजों में यह एक आम भ्रांति है कि जमीन के अन्दर उत्पन्न चीजों को नहीं खाना चाहिएं। इसका कोई भी वैज्ञानिक कारण नहीं है। नए शोधों के कारण मूली, गाजर, प्याज और लहसुन तो डायबिटीज में बहुत लाभदायक हैं। इन चीजों को मरीज जितना चाहें उतना खा सकता है। लहसुन और प्याज तो एन्टीआक्सीडेनट गुणों से भरे हैं। मूली कई तरह से उपयोगी है। गाजर में भी अतिमहत्वपूर्ण विटामीन, ट्रेस पदार्थ मिनरल्स होते है। जो इन्सुलीन को संवेदनशील बनाते हैं। शलजम और बीट भी काफी उपयोगी हैं। अगर अबतक आप इन चीजों से परहेज करते रहे हैं तो अब इन्हें भरपूर मात्रा में खाकर अपनी बीमारी को नियंत्रित कीजिए।
11. डायबिटीज में हाई-हो बी.पी.तो स्पेशल दवा लीजिए
डायबिटीज में यदि ब्लड प्रेशर भी हो गया है तो एस इन्हीबीटर ग्रुप की दवा लेना आवश्यक है। इस ग्रुप में एनाप्रील या रैमीप्रील दवा आती है। इसी तरह की दवा एनजियोटेन्सीन रिसेप्टर ब्लाकर है जिसमें लोसारटन, ओलमीसरटन या टेलमीसारटन है। दूसरे ग्रुपों की दवा डायबिटीज के मरीजों को देना जरूरी है। इन दवाओं के कारण किडनी स्वस्थ्य रहती है। इसके साथ इन दवाओं के प्रयोग से डायबिटजी में व हार्ट अटैक से भी बचाव होता है। इसके अलावा इससे इंसुलिन की कार्यप्रणाली भी सुधरती है। आंखों में डायबिटीज के कारण होने वाली रेटिनोपैथी में भी सुधार होता है जिस दवा में इतने गुण हो उसे डायबिटीज के मरीज को अवश्य लेना चाहिए।
12. इनहेलर है मँहगा इतना कि अमेरिका में भी लोकप्रिय नहीं
आजकल इंसुलीन के इन्हेलर की बड़ी चर्चा है। अमेरिका में उपलब्ध हो जाने के बाद अब भारत में इसकी प्रतिक्षा की जा रही है। अच्छी खबर यह है कि यह इंसुलिन की सुई की तरह ही प्रभावकारी है। सांस द्वारा फेफड़े में जाने के बाद यह अवशोषित होकर रक्त में शुगर को संतोषजनक ढंग से कम कर देता है। जिन मरीजों को इंसुलिन लेना जरूरी है मगर सुई लेने से डर लगता है उनके लिए यह बड़ी अच्छी चीज है। यह अभी काफी महंगा है मगर भविष्य में इसका दाम कम होगा। जो मरीज दमा से पीड़ित हैं या सिगरेट पीते हैं उनमें इस इन्हेलर से समस्या पैदा हो सकती है। यह पता नहीं कि बहुत दिन इस्तेमाल के बाद यह कितन सुरक्षित है। यह तो समय ही बताएगा।
13. एक वरदान की तरह है स्टेटीन दवा
डायबिटीज में लिपिड प्रोफाइल पर ध्यान देना अति आवश्यक है। अपना कोलेस्ट्राल 200 मिग्रा के नीचे, एलडीएल कोलेस्ट्राल 100मिग्रा से नीचे, एचडीएल कोलेस्ट्राल 45 मिग्रा के उपर व ट्राई ग्लाइसेराइड 160 मिग्रा के नीचे रखना जरुरी है। आजकल सभी डायबिटीज के मरीजों को स्टेटीन ग्रुप की दवा एटोखास्टेटीन खाने की सलाह दी जाती है। इससे लिपिड प्रोफाइल संतुलित रहता है और इससे हार्ट अटैक व स्ट्रोक का खतरा कम रहता है। स्टेटीन ग्रुप की दवा को जीवन पर्यन्त खाने की सलाह दी गई है। इस दवा को डायबिटीज में एक वरदान की तरह समझा जाता है।
14. इंसुलीन लेने वालों,सीखो कुछ खास बातें
इंसुलीन लेने वाले लोगों को कुछ खास बातों पर ध्यान रखना चाहिएं। जैसे इंसुलीन का इंजेक्शन चमड़े के नीचे लिया जाता है इसलिए उसी शक्ति का सिरींज लेन आवश्यक है। इंसुलीन को हमेशा चार से आठ डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। सुई लेने से पहले उसे हथेलियों पर रगड़ कर इसे सामान्य तापमान पर ले आये। इंजेक्शन लेने के लिए डिस्पोजल सुई आती है। एक सुई का इस्तेमाल यदि एक ही आदमी कर रहे हैं तो एक सुई का इस्तेमाल छह से आठ बार किया जा सकता है। इसके अलावा यह भी ख्याल रखे कि यह इंजेक्शन खाना खाने के आधे घंटे पहले लेना आवश्यक है मगर नोवोमिक्स या लेवमोर जैसे एनालाग इंसुलिन को खाने के ठीक पहले भी ले सकते हैं। जब भी सुई ले इस बात का ख्याल रखे कि इसे नाभि के चारों ओर दो इंच स्थान छोड़ कर, जांघ, कुल्हों और बांहों पर ही ले। इस बात का ध्यान रखे कि तुरंत-तुरंत इंजेक्शन का स्थान नहीं बदलें।
15. भारी इमरजेन्सी है ब्लड शुगर का कमना
डायबिटीज में हाईपोग्लायसिमीया यानि ब्लड शुगर का अचानक घट जाना भारी परेशानी हो सकता है। इससे बचने के लिए कुछ खास बातों पर ध्यान देना जरूरी है। दवा की निर्धारित मात्रा ही खाएं। इंसुलीन की भी निर्धारित मात्रा लें। अपने मन से दवा की मात्रा में ज्यादा हेर फेर नहीं करे। दवा व इंसुलीन लेते हुए जितना भोजन प्रतिदिन कर रहे हो उसे नहीं छोड़े। कम भोजन लेने से दवा के प्रभाव से ब्लड शुगर जरुरत से ज्यादा कम हो सकता है। रोज जितना व्यायाम कर सकते है उससे ज्यादा मत करें। ज्यादा व्यायाम करने से ब्लड शुगर काफी कम हो सकता है। इंसुलीन के लेने की जगह भी बार-बार नहीं बदलें। हर जगह से इंसुलीन अवशेषित होने की दर अलग-अलग होती है। उपवास या अन्य बीमारी होने पर ब्लड शुगर चेक कराकर ही दवा ले। इन बातों पर ध्यान देकर जानलेवा खतरों से बचा जा सकता है।
16. धन्य हैं भ्रान्ति फैलाने वाले
डायबिटीज में भ्रान्तियां फैलाने का काम वैसे लोग करते हैं जिन्हें बीमारी की जानकारी नहीं होती। चावल नहीं खाना वैसी ही एक भ्रान्ति है। चावल खाना मना नहीं है लेकिन मरीजों के मन में इसे बैठा दिया जाता है कि चावल जहर के सामान है। आश्चर्य का विषय यह है कि अधिकांश मरीजों में यह भ्रान्ति है कि खाली पांव ही पैदल चलना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। रोगियों को कभी भी खाली पांव नहीं चलना चाहिए। यह भी भ्रान्ति है कि दूसरी चिकित्सा पद्धति से बीमारी दूर हो जायेगी लेकिन कई मरीज इस रोग का होम्योपैथिक उपचार कर भयानक परेशानी में फंस चुके हैं। किसी भी पद्धति में यह बीमारी जड़ से दूर नहीं होती। इंसुलीन के बारे में एक और भ्रान्ति यह है कि एक बार सुई लेने पर जिन्दगी भर सुई लेना पड़ता है लेकिन सच्चाई यह है कि कभी कभी तीन चार माह तक सुई लेने के बाद सिस्टम रिचार्ज हो जाता है और दवाएं काम करने लगती है।
17. बहुत कुछ है भविष्य की झोळी में
डायबिटीज के मरीजों को भविष्य में कुछ नये उपहार मिलने की संभावना है। इसमें से सबसे प्रमुख है इंसुलीन का इनहेलर। इस रोग में फिलहाल इंसुलीन की सूई बार बार लेना आवश्यक है इस तकनीक से सांस के द्वारा इंसुलीन लिया जायेगा। यह ठीक वैसा ही होगा जैसा कि दमा का इन्हेलर होता है। एक्सेनाइड भी एक नई दवा है। यह इनक्रेटीन ग्रुप की दवा है । यह इंसुलिन जैसा ही असर करता है मगर फिलहाल इसका इंजेक्शन ही उपलब्ध है और मरीज को इसे दो बार लेना होगा। नये शोधों में हालांकि इसे ज्यादा फायदेमंद नही बताया गया है। इसके साथ इंसुलिन का टैब्लेट भी बनने की प्रक्रिया में है। जब यह बाजार में आयेगा तो रोगियों को काफी राहत मिलेगी।
18. सावधान रहें डायबिटीज से पीङित महिलाएँ
महिलाओं में डायबिटीज विशेष समस्या पैदा करता है। सामान्यतः महिलाओं में फिमेल सेक्स हारमोन के प्रभाव से 45 वर्ष के पहले हार्ट अटैक नहीं होता लेकिन डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं में यह नियम काम नहीं करता। उन्हें कम उम्र में भी हार्ट अटैक हो सकता है। हार्ट अटैक के पारम्परिक लक्षणों में छाती में तेज दर्द तीस मिनट से ज्यादा होना और साथ में खूब पसीना आना है। मगर डायबिटीज में कई मरीजों में केवल ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। साथ में खूब चक्कर भी आते हैं और सांस फूल जाती है। ऐसी हालत में कई बार ईसीजी करानी पड़ती है। डायबिटीज से ग्रस्त कम उम्र महिलाओं में यदि छाती के दर्द की शिकायत हो तो उसे गम्भीरता से लेना चाहिए।
19. क्या इन प्रश्नों के उत्तर आपके पास है?
आजकल डायबिटीज के मरीजों को अपना एक चेक लिस्ट बनाने की सलाह दी जाती है। उन्हें इसके तहत कुछ प्रश्नों को महीने में एक बार स्यवं पूछना चाहिए -

  • क्या मैने अपना ब्लड शुगर इस माह नपवा लिया?

  • क्या हर छह माह में एक बार ग्लायकोसाइलेट हीमोग्लोबीन का टेस्ट कराया है?

  • क्या मुझे ब्लड शुगर घटने यानि हापोग्लायसिमिया के लक्षणों की जानकारी है?

  • क्या हर साल डायबिटीज के कारण होने वाली आंखों की रेटिनोपैथी की जांच हुई है?

  • क्या डायबिटीज में पैरों की देखभाल की पूरी जानकारी ले ली गई है?

  • क्या साल में एक बार पैरों की जांच करायी गई है?

  • क्या मेरे बच्चों में डायबिटीज होने का रिस्क है?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर आपके पास हैं तो आपको डायबिटीज से कोई परेशानी नहीं हो सकती।

20. नपुंसकता हो जायेगी ठीक,थोङा धैर्य रखिए
नपुसंकता डायबिटीज का एक छुपा हुआ दुष्प्रभाव है। इसे इरेक्टाइल इंफेक्शन कहते है। डायबिटीज से ग्रस्त लोगों में इसकी व्यापकता दर 66 प्रतिशत रहती है। किसी की यदि इरेक्टाइल इंफेक्शन है तो इससे सिर्फ सेक्स की समस्या ही नहीं बल्कि हार्ट अटैक या स्ट्रोक की समस्या भी हो सकती है। यौन क्रिया की इच्छा में कमी, प्रेमेच्चयोर इजाकुलेशन या रेट्रोग्रेड इजाकुलेशन आदि लक्षणों का भी कारण डायबिटीज हो सकता है। जिन्हें दस या पंद्रह साल से यह रोग है उन्हें यह समस्या ज्यादा होती है लेकिन इसमें निराश होने की जरुरत नहीं। कुछ जांच के द्वारा इसका इलाज संभव है। डायबिटीज पर सही नियंत्रण और उचित इलाज के सहारे इस समस्या को काबू में रखा जा सकता है।
21. आपरेशन कराना है? हो जाएगा
डायबिटीज के मरीजों में आपरेशन करने के पहले ज्यादा सतर्कता की जरुरत होती है। कोई भी मेजर आपरेशन एवं सामान्य एनेथिसिया के प्रयोग से मरीजों को परेशानी हो सकती है। मगर आपरेशन के पहले खूब अच्छी तरह से ब्लड शुगर का नियंत्रण रखा जाएं तो कई दुष्परिणामों से बचा सकता है। आजकल किसी भी तरह का मेजर आपरेशन डायबिटीज के मरीजों का करना सम्भव हो गया है। इस समय मरीजों को दवाएं कम कर इंसुलिन की सुई देना चाहिए। इससे ब्लड शुगर ज्यादा अच्छे ढंग से नियंत्रित रहती है। आपरेशन के कुछ समय बार मरीजों को फिर से दवाएं दी जा सकती है। डायबिटीज के रोगियों को आपरेशन के नाम से घबारने की जरुरत नहीं । सही दिशा निर्देश से वे आरामदायक जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
22. आपके पावँ देखे,खूबसुरत हैं,इन्हें जमीन पर मत रखिएगा
डायबिटीज के रोग में मरीज को पैरों की देखभाल पर खास ध्यान देना चाहिए। बहुत से मरीज ऐसी हालत के बाद भी नंगे पांव ही मार्निंग वाक पर चले जाते है लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिएं। रोगियों को डायबिटीज में नंगे पांव चलने से परहेज करना चाहिए। इसके लिए सही साइज का आरामदायक जूता या चप्पल पहनना चाहिए। कसे, ऊंची एड़ी और बैकलेस जूते का कभी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पैरों को इसके साथ ही प्रतिदिन गुनगुने पानी और साबुन से अवश्य धोये। पैरों की अंगुलियों के नाखून को हमेशा सीधा काटें। पैरों में किसी तरह का घाव हो तो तुरंत डाक्टर से मिले पैरों की देखभाल सही समय पर नहीं करने के कारण ही पूरे विश्व में प्रत्येक तीस सेकेण्ड पर एक पैर को डायबिटीज के कारण काटना पड़ रहा है। सावधानी से ही इस स्थिति से बचा जा सकता है।
23. मेथी खाइए,बढिया है
मेथी डायबिटीज मरीजों के लिए काफी लाभदायक है। मेथी के बीज की महत्ता हाल में हुए कई वैज्ञानिक शोधों में सिद्ध हुई है। इसके खाने से ब्लड शुगर घटने लगता है। यह ग्लुकोज टोलरेन्स के प्रोफाईल को ठीक करता है एवं उसके दुष्परिणामों से भी बचाता है। टाईप वन व टाइप टू दोनों प्रकार के डायबिटीज में मेथी की 25 ग्राम की मात्रा लाभदायक होती है। इसमें जो फाइबर होता है। वह कोलेस्ट्राल की मात्रा को भी कम करता है। मेथी में एक जैव रसायन ट्राइजोनेनालिन होता है जो शुगर को कम करता है। इसे रात में पानी में भिंगों दे और सुबह इसे खा लें। इसके अलावा इसे अंकुरित होने के बाद भी खाया जा सकता है। आजकल गेहूं के आटे के साथ भी लोग मेथी को मिलाकर खाते हैं।
24. गर्भावस्था के दौरान शुगर हो जाए तो?
जब डायबिटीज का पता पहली बार गर्भावस्था के दौरान चले तो इसे गेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। इस समय महिलाओं के शरीर में इंसुलिन के ठीक से काम नहीं करने देने वाले कुछ एन्टी इंसुलीन स्रावित होते है। इसके कारण ब्लड शुगर ज्यादा बढ़ जाता है। प्रसव के बाद यह प्रभाव अपने आप समाप्त हो जाता है और ब्लड शुगर पुनः सामान्य हो जाता है। गेस्टेशनल डायबिटीज मुख्य तौर पर गर्भधारण के 26 से 36वें सप्ताह के बीच होता है। खासकर वैसी महिलाएं जिनका वजन व उम्र ज्यादा हो, घर में किसी और को डायबिटीज हो, पहले गर्भधारण में शुगर बढ़ गया हो तो गेस्टेशनल डायबिटीज होने का खतरा रहता है। एक बार जिन्हें गेस्टेशनल डायबिटीज हो जाता है उन्हें भविष्य में टाइप- टू डायबिटीज होने का खतरा रहता है। ऐसी महिलाओं को खान-पान पर नियंत्रण व व्यायाम शुरू कर देना चाहिए।
25. जिन्दगी भर खाइए रक्तचाप की दवा
डायबिटीज के मरीजों में स्ट्रोक यानि ब्रेन अटैक होने की संभावना बढ़ जाती है। स्ट्रोक एक खतरनाक दुष्परिणाम है। डायबिटीज के साथ यदि उच्च रक्तचाप है तो स्ट्रोक का खतरा ज्यादा रहता है। मगर शोधों से पता चला है कि ब्लड शुगर का ठीक से नियंत्रण करके एवं रक्तचाप की दवा रोज खाकर स्ट्रोक से बचा जा सकता है। डायबिटीज के मरीजों को रोज एसपीरिन व स्टेटिन खाने से स्ट्रोक से बचाव होता है। डायबिटीज के मरीज अक्सर उच्च रक्तचाप की दवा छोड़-छोड़ कर खाते हैं। यह बहुत गलत आदत है। इसका खमियाजा स्ट्रोक जैसी बीमारी के रूप में सामने आ सकता है। इसलिए मरीजों को डाक्टर के बताये निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना चाहिए।
26. जो दवा सुरक्षित उसे ही खाएँ
आज भी सलफोनायल ग्रुप की दवाएं डायबिटीज के नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है। टालबुटामाइड दवा एवं क्लोरप्रोपानाइड दवा अब प्रयुक्त नही हो रही। इसी ग्रुप की दवा ग्लीबेनक्लामाइड इन दिनों खूब चल रही है। मगर इन दवाओं से रक्त में शुगर की मात्रा घटने का खतरा ज्यादा रहता है। इस ग्रुप की नई दवाएं ज्यादा सुरक्षित है। ग्लीपीजाइड, गिलिकलाजाइड व गिलिमीपेराइड कम समय के लिए काम करती है और लगातार सेवन के लिए ज्यादा अच्छी होती है। हृदय रोगियों के लिए गिलिमीपेराइड व गिलिकलाजाइड ज्यादा सुरक्षित है। इन सभी दवाओं को भोजन के पहले लेना चाहिए ताकि दवाएं अच्छी तरह से काम कर सके लेकिन यदि उपवास कर रहे हैं तो इन दवाओं को नहीं खाएं।
27. नियंत्रण के लिए दो सबसे जरूरी बातें
  • अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन ने 2006 के सम्मेलन के बाद ब्लड शुगर नियंत्रण के मानकों को नये ढंग से पेश किया है। अब शुरूआती दौर में डायबिटीज के नियंत्रण के लिए जो दो सबसे जरूरी बातें है :
    एक तो व्यापक व्यायाम और
    दूसरी मेटफारमीन दवा।

  • चिन्ता की बात है कि मरीज व्यायाम को आवश्यक नहीं मानते और कुछ दिन करने के बाद छोड़ देते हैं। मेटफारमीन दवा बाजार में ग्लुकोमेट, वालाफेज, या जोमेट के नाम से आती है। इस दवा का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह लीवर से निकलने वाली अत्याधिक ग्लुकोज को रोक लेती है और मोटापे को काबू में रखती है। मटफारमीन के प्रयोग से ब्लड शुगर ज्यादा घटने का डर नहीं रहता।


28. खाने से बाद शुगर ज्यादा बढे तो हार्ट को खतरा
डायबिटीज में खाने के बाद बढ़ने वाले शुगर को खासतौर पर खतरनाक माना जाता है। ज्यादा वसा युक्त एवं कार्बोहाईड्रेट युक्त भोजन ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाता है। साथ में खतरनाक ट्राईग्लेसाइड एवं एलडीएल कोलेस्ट्राल बढ़ाता है। इसके कारण हृदयाघात होने व अन्य दुष्परिणामों का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए कम से कम चर्बी युक्त भोजन को एवं कार्बोहाईड्रेट को प्राकृतिक तौर पर फाइबर सहित खाएं। रिफाइंड युक्त पदार्थो से बचें। इस पोस्ट प्रक्न्डीयल हाईपर ग्लायसिमिया से बचने के लिए आजकल एकारबोज, मिगलिटोल, ग्लीटानाइडस एवं मेटफारमिन की दवा काफी उपयोगी है। इन दवाओं को डायबिटीज में खाना खाने के तुरंत बाद दिया जाता है। इससे तेजी से रक्त शुगर की मात्रा नही बढ़ती।
29. बीमारी के बारे में ज्यादा जानो तो उमर होगी लम्बी
डायबिटीज के महानतम विशेषज्ञ डा. जोसलिन ने कहा था कि जो मरीज अपनी बीमारी के बारे में ज्यादा जानता है वह ज्यादा दिनों तक जिन्दा रहता है। इस कथन का तात्पर्य यह है कि इस बीमारी में स्वास्थ्य शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है। केवल डाक्टर के भरोसे बीमारी की सही देखभाल नही हो सकती।मरीज को स्वयं जागरूक होना पड़ेगा। आजकल कई महत्वपूर्ण वेबसाइट है जिसपर प्रमाणिक जानकारी मौजूद है। मरीज अक्सर चिकित्सक को पूरी बात नही बताते जिसके कारण कई बार खतरनाक परिणाम सामने आ जाते हैं। मरीज और डाक्टर दोनो को उपचार के समय सही जानकारी के आदान-प्रदान पर जोर देना चाहिए।
30. सही समय पर इलाज है तगडा इन्सयोरेन्स
डायबिटीज रोग का इलाज शुरू में ही कराना आवश्यक है डायबिटीज के मरीजों के सही इलाज का मतलब है कि उन तमाम फैक्टरों पर नियंत्रण रखा जाये जिनसे भविष्य में आखों के अंधापन, हृदय, गुर्दा, नस और पैरों में खराबी नहीं उत्पन्न हो। इसके लिए आवश्यक है कि आप शुरूआती दौर में ही पैरों की पूरी जांच, छाती का एक्सरे, आंखों का टेस्ट आदि करा ले। इसके अलावा हर छह माह पर लिपिड प्रोफाइल, माइक्रल टेस्ट, ब्लड यूरिया एवं क्रियेटिनिन की जांच, हर तीन माह पर ग्लायकासाइलेटेड हीमोग्लोबिन एवं सप्ताह में एक बार ब्लड शुगर टेस्ट कराना आवश्यक है। सही समय पर इलाज नही कराने पर मरीज को की तरह की परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
31. दूसरी बीमारी के समय सावधान
बरसात के इस मौसम में डायबिटीज रोगियों को कई तरह का खतरा रहता है। खासकर बरसात के मौसम में दूषित जल पीने से डायबिटीज रोगियों को डिहाईड्रेशन होने लगता है जिससे रोगियों में ब्लड शुगर घटने का खतरा पैदा हो सकता है। यदि इस हालत में ब्लड शुगर 60 मिली ग्राम के नीचे चला जाये तो मरीज बेहोश भी हो सकता है। इस तरह का संक्रामण होने पर डायबिटीज की दवाएं तत्काल बंद कर देनी चाहिए। इसके बाद ब्लड शुगर की फौरन जांच करानी चाहिए। यदि ब्लड शुगर बढ़ा हुआ पाया गया तब भी डाक्टर से सलाह लेकर ही डायबिटीज की दवाओं का सेवन करना चाहिए। यदि डायबिटीज रोगियों को जोनडीस हो जाये तो विशेष इलाज की जरूरत रहती है।
32. छह बातों पर ध्यान देना आवश्यक है
डायबिटीज से बचाव के लिए नये गाइड लाईन्स के अनुसार छह बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।
  • 1. बाडी मास इन्डेक्स यदि 23 से ज्यादा है तो कम से कम अपना वजन सात प्रतिशत कम करें।
  • 2. भोजन में कम से कम चर्बी का प्रयोग करें।
  • 3. प्रोटीन की ज्यादा मात्रा नहीं ले।
  • 4. भोजन में रेशे वाले पदार्थ खूब खाएं।
  • 5. रिफाइन्ड भोज्य पदार्थो से बचे।
  • 6. सप्ताह में कम से कम ढाई घंटे व्यायाम करें। नये गाईड लाईन्स में अल्कोहल लेने की वकालत नहीं की गई है। कुछ शोधो में यह अवश्य बताया गया है कि कम मात्रा में अल्कोहल लेने से डायबिटीज में बचाव होता है। हफ्ते में दो बार मछली खाने को भी महत्वपूर्ण माना गया है मगर तली मछली की जगह उसका झोल लेना ही ठीक रहता है। पर्याप्त मात्रा में फल खाना भी लाभकारी है। डायबिटीज से बचना सम्भव है बशर्ते आपको अपना लाइफ स्टाइल बदलना होगा।
33. रोज एक ही तरह का भोजन कर जीवन नीरस मत बनाइए
डायबिटीज रोगियों को भोजन तालिका दी जाती है लेकिन उसका यह मतलब नहीं कि रोज एक ही तरह का भोजन कर जीवन नीरस बना ले। थोड़ा सा हेर फेर करके एवं कैलोरी का संतुलन बना कर विभिन्न प्रकार के भोजन का आनन्द उठा सकते हैं। जैसे यदि आपको दिन में तीन रोटी खाने को कहा गया है तो एक चपाती जिसमें 80 कैलोरी होती है, उसकी जगह आप एक कटोरी चावल भी खा सकते हैं। इस तरह दो रोटी और एक कटोरी चावल खाने पर भी आपको उतनी ही कैलोरी मिलेगी। डायबिटीज में चावल खाने की मनाही नहीं है। जमीन के नीचे उपजने वाले चीजों को भी लोग डायबिटीज में खाना बंद कर देते है लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। आप इच्छानुसार प्याज, लहसून, मूली, गाजर और आम का सेवन कर सकते है। यदि आपका रोग नियंत्रित है तो एक या दो आम खाने में कोई हर्ज नहीं है। मछली और कागजी बादाम तो रोज खाना चाहिए।
34. पावर-हाउस है कागजी बादाम
डायबिटीज के मरीज के लिए रोज एक मुट्ठी कागजी बादाम खाना अब जरूरी माना जा रहा है। लोगों में यह भ्रम है कि बादाम में चर्बी ज्यादा होती है और इसे डायबिटीज में नहीं खाना चाहिए लेकिन कागजी बादाम में उत्तम कोटि का प्रोटीन होता है व 80 प्रतिशत घुलनशील फाइबर होता है जो कोलेस्ट्रोल घटाता है, कब्ज दूर कर आंतों को ठीक रखता है। इसमें जो चर्बी होती है वह एन-3 प्रकार की होती है जो इंसुलीन को संवेदनशील ओर कारगर बनाती है। इसका फासफोरस और कैलाशियम हड्डी को ठीक रखता है। इसका मैगनेशियम विटामिन -6, आयरन, जिंक, कापर, मैंगनीज, सेलेनियम, थायमीन, आदि पोषक तत्व डायबिटीज होने से बचाता है और मरीजों में ब्लड शुगर नियंत्रित करता है । इसके खाने से वजन भी कम होता है।
35. तीन आधारभूत बातें नियन्त्रण के लिए
डायबिटीज रोगियों को तीन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। इसमें प्रथम है सही खानपान। रोगियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सही कैलोरी का निर्धारण कर ही भोजन ले। खाने में परिवर्तन से ब्लडसुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। ज्यादा कैलोरी लेने से शरीर को ज्यादा इंसुलीन की भी आवश्यकता पड़ती है। इसके साथ दूसरी महत्वपूर्ण बात है योग और व्यायाम। इसके अभाव में शरीर में इंसुलीन काम नहीं करता व्यायाम करते ही इंसुलिन रिसेप्टर संवेदनशील हो जाते हैं और शरीर में उर्जा उत्पन्न करते हैं। तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है दवा व इंसुलीन । याद रखें सिर्फ खान पान और व्यायाम के भरोसे डायबिटीज संतुलित नहीं रह सकता। इसलिए तीनों बातों पर खयाल रखेंगे तो डायबिटीज का रोग काबू में रहेगा।
36. अब डायबिटीज को माना जाता है हार्ट की बीमारी के बराबर
डायबिटीज में हृदय रोग बढ़ते की संभावना ज्यादा रहती है। डायबिटीज के कारण हृदय की कोरोनरी नली में चर्बी का जमाव तेजी से होने लगता है। आटोनामिक न्यूरोपैथी के कारण हृदय की गति और दबाव पर असर होने लगता है। हृदय की मांसपेशियों का मेराबोलिज्म गड़बड़ाने से हृदय फेल होने की संभावना बढ़ जाती है। सामान्य लोगों में इसचिमिक या हृदयघात संबंधों रोग होने की दो से चार प्रतिशत संभावना रहती है वही डायबिटीज रोगियों में 55 प्रतिशत तक इसकी संभावना रहती है। कई बार डायबिटीज रोगियों को खतरनाक आघात बिना दर्द के ही हो जाता है और इसके कारण समय पर निदान नहीं हो पाता है। इसे साइलेन्ट इसचिमिया कहते हैं। यही कारण है कि हृदय संबंधी लक्षण नहीं होने पर भी साल में एक बार इ.सी.जी या फिर टी.एम.टी एवं इकोकारडियोग्राफी कराने की जरुरत डायबिटीज में होती है। समय पर समस्या की जानकारी होने पर इलाज आसान हो जाता है।
37. माँ-बाप को डायबिटीज है तो सावधान रहें बच्चे
अगर आपके घर में किसी को भी डायबिटीज की बीमारी है तो बच्चों में यह रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। यदि माता-पिता दोनों को यह बीमारी है तो इसका खतरा 99 प्रतिशत और किसी एक को बीमारी रहने पर 40 प्रतिशत खतरा रहता है। ऐसे लोगों को सतर्क रहने की जरुरत है और साल में एक बार ब्लड सुगर की जांच अवश्य कराना चाहिए। समय पर बीमारी की जानकारी हो जाने के बाद इलाज में आसानी होती है और मरीज को भी खतरा नही रहता। बीमारी की जानकारी होने के लिए लक्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए। वैसे इस बीमारी में खूब पेशाब आना, भूख और प्यास लगना, पैरों में जलन व झुनझुनी, कमजोरी, वजन घटना और पेशाब के रास्ते में सूजन मुख्य लक्षण है।
38. चमत्कारी दवा है स्टेटीन
डायबिटीज में लिपिड प्रोफाइन ठीक रखकर हार्ट अटैक से बचा जा सकता है। सन 2008 के मानकों के अनुसार एलडीएल कोलेस्ट्राल 100 मिग्रा से नीचे, एचडीएल कोलेस्ट्राल 50 मिग्रा से ज्यादा एवं ट्राइग्लायसेराइढ़ 150 मिग्रा से कम होना चाहिए। कई बार भोजन के नियंत्रण एवं शारीरिक श्रम से लिपिड प्रोफाइल सामान्य हो जाता है। आजकल डायबिटीज की बीमारी को हार्ट की बीमारी के समकक्ष समझा जाता है और सभी रोगियों को स्टेटीन ग्रुप की दवा खाने की सलाह दी जाती है। इसमें एटोरवास्टेटीन का प्रयोग ज्यादा होता है। इसकी 10 मिग्रा की मात्रा हार्ट अटैक व ब्रेन स्ट्रोक से बचाव करती है इसे रोज खाना चाहिए।
39. गर्भधारण के पहले ही ब्लड शुगर की जांच करा ले
गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज को नियंत्रित करना अत्यन्त आवश्यक है। इस अवस्था में यदि डायबिटीज पर काबू नहीं रखा जाये तो सिजेरियन सेक्शन करना पड़ सकता है। इसके अलावा भ्रूण का विकास नहीं हो पाता, नवजात शिशु को सांस लेने में परेशानी होती है और कभी-कभी पेट में ही शिशु की मौत हो सकती है। ख्याल रखे गर्भावस्था के दौरान ब्लड सुगर 105 मिग्रा के आसपास होना चाहिए चाहिएं। इस अवस्था में कम से कम दो बार ब्लड शुगर जांच कराना चाहिए। टहलना जारी रखें और दवाईयों का प्रयोग नहीं करें। ऐसे समय में इंसुलीन की सूई ही सुरक्षित है। प्रसव के बाद भी इंसुलीन तब तक लेना चाहिए जब बच्चा स्तनपान कर रहा हो। गर्भधारण के पहले ही ब्लड शुगर की जांच करा ले और शुरुआती दौर से ही इंसुलीन लेना शुरू कर दें। भोजन पर भी खास ध्यान रखें।
40.ग्लायकोसाइलेटेड हीमोग्लोबीन सबसे अच्छा टेस्ट है नियन्त्रण जानने के लिए
डायबिटीज में ब्लड शुगर की मात्रा रोज ही बदलती रहती है। केवल एक अध्ययन से इसका सही जायजा लेना मुश्किल होता है लेकिन ग्लायकोसाइलेटेड हीमोग्लोबीन एक ऐसा टेस्ट होता है जिससे एक ही अध्ययन में ब्लड शुगर का नियंत्रण पता चल जाता है। आजकल अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन ने इसे हर तीन माह पर कराने का निर्देश दिया है। भारत में जागरुकता के अभाव में ऐसा नहीं हो पाता लेकिन यह आवश्यक है। अगर आपका ब्लड शुगर सात से आठ प्रतिशत से बीच है तो संतोषजनक और आठ से दस प्रतिशत होने पर मामला गम्भीर है। यह टेस्ट थोड़ा महंगा जरूर है लेकिन जब डाक्टर इसे करने को कहें तो इसे अवशय करा लें।
41. शुरूआती दौर में केवल भोजन का नियंत्रण और उचित व्यायाम
किसी डायबिटीज मरीज को शुरूआती दौर में केवल भोजन का नियंत्रण और उचित व्यायाम द्वारा सामान्य रखा जा सकता है। बहुत से मरीजों में शुरूआती दौर का ब्लड शुगर 300 मिग्रा के उपर रहता है मगर बिना दवा के भी केवल भोजन के नियंत्रण एवं फास्ट वाकिंग से सामान्य से नीचे आ जाता है। व्यायाम बहुत आवश्यक इलाज है मगर इसके पहले कुछ बातों पर गौर आवश्यक है। यह देख लें कि पैरों में किसी तरह का कोई संक्राण नहीं हो। बहुत ज्यादा सर्दी या गर्मी हो तो व्यायाम नहीं करें। जरुरत से ज्यादा शारीरिक व्यायाम ब्लड शुगर इतना कम कर सकता है कि हाई पोग्लायसिमिया के लक्षण आ सकते हैं। आधे घण्टे पहले पर्याप्त मात्रा में पानी पी लें। साथ में ग्लुकोज पाउडर भी रखें। नंगे पैर नहीं चलें और पीठ सीधी रख कर हाथों को आगे और पीछे कर खूब चले।
42.खाइए तीन गोली मगर अहसास हो एक गोली खाने का
आजकल डायबिटीज में वैसी दवाओं को मिला कर दिया जाता है जिनसे इंसुलिन ज्यादा निकले और मांशपेशियों में जाकर ज्यादा संवेदनशील हो जाए। गिलीमीपेराइड, मेटफारमीन, एवं पायोग्लीटाजोन को मिलाकर एक ऐसी दवा बनाई गई है। गिलीमीपेराइड इंसलिन को बीटा सेल्स से ज्यादा मात्रा में निकालता है। मेटफारमीन और पायोग्लीटाजोन इंसुलिन सेन्सीटाइजर की तरह कार्य करता है। ट्राइवेट, , जोरील एमपी या इक्यूलाइड एमपी आदि ब्रांड नाम से यह दवाएं उपलब्ध है। तीन गोली को मिला कर एक गोली लेने से मरीज को बहुत आसानी हो जाती है। यह कम्बीनेशन वैज्ञानिक ढंग से बहुत अच्छा है। इसे टिपल पील थेरापी कहते हैं। जो मरीज बहुत ज्यादा टेब्लेट खाकर परेशान हैं उन्हें एक ही टेब्लेट लेने में आसानी होगी।
43. सदियों से इस बीमारी को राज रोग कहा जाता है
डायबटीज का इतिहास बहुत पुराना है। यह एक ग्रीक शब्द है जिसका मतलब साइफन होता है अरेटीयस ने ऐसा शब्द इस बीमारी में पानी शरीर में नही ठहरता है। यह आदमी के शरीर को एक चैनल की तरह प्रयुक्त करता है। अरेटीयस ने उसे समय इस बीमारी के लक्षणों में ज्यादा शराब का होना, वजन का घटना बताया था। करीब चार सौ वर्ष ईसा पूर्व भारत में सुश्रूत ने ही इस बीमारी का नाम मधुमेह रखा था। उन्होंने ना सिर्फ इस बीमारी के दो रूपों में की चर्चा की थी बल्कि खानपान व व्यायाम के द्वारा इससे बचने के उपाय भी बताये थे। अमेरिका के ईलियट पी जासलीन ने दुनिया में पहली बार 293 मरीजों पर इंसुलिन का प्रयोग किया एवं 20वीं शताब्दी के सबसे चर्चित विशेषज्ञ होने की ख्याति प्राप्त की। सदियों से इस बीमारी को राज रोग कहा जाता है।
44. पैरों में जलन है, धैर्य रखिए, ठीक हो जाएगा
डायबिटीज रोगियों में न्यूरोपैथी की समस्या भी बड़ी अहम होती है। इसके कारण डायबिटीज रोगी के पैर में तेज जलन और संवेदना के अभाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जब यह परेशानी हो जाती है जो मरीज को आग में पांव रखने या फिर पैर से किसी नुकीली चीज लगने पर भी पता नहीं चलता। इसके कारण पैर में घाव होने का समस्या हो जाती है और जल्द इलाज नहीं कराने पर पैर काटने की भी नौबत आ सकती है। लेकिन यदि मरीज ने तत्काल इसका उपचार शुरू कर दिया तो कई तरह की समस्याओं से बचा जा सकता है। न्यूरोपैथी में फिलहाल गावापेंटिन और प्रिगैबलीन दवा को रामबाण कहा जा सकता है। हालांकि एक बात यह है कि तत्काल इसका प्रभाव नहीं दिखता । इसका प्रभाव दिखने में तीन से छह माह तक का समय लग सकता है लेकिन जलन और अन्य परेशानी से एक माह के अंदर लाभ मिल जाता है इसलिए मरीज को धैर्य नहीं खोना चाहिए।
45. दस बातें ,फिर आराम ही आराम
डायबिटीज की सही देखभाल के लिए दस नियम हैं।
  • 1. दवाओं में गिलीमीपराइड सबसे अच्छी मानी जाती है। इसे दिन में एक बार लेना चाहिए।

  • 2. अपना ग्लायकोसाइलेटेड हिमोग्लोबीन 6.5 के नीचे रखे।

  • 3. पाईगिलटाजोन दवा साथ में लेना जरूरी है। मगर हृदय फेल होने और शरीर में पानी रहने पर इसे न लें।

  • 4. अगर ग्लायकोसाइलेटेड हीमोग्लोबीन 7.5 प्रतिशत से ज्यादा रहा तो इंसुलिन लेना शुरू कर दें।

  • 5. ब्लड शुगर को सही ढंग से नियंत्रित रखे।

  • 6. अपना रक्तचाप 130.80 से कम रखे।

  • 7. अपना लिक्विड प्रोफाइल हर हाल में सही रखे।

  • 8. आंखों की जांच वर्ष में अवश्य कराए।

  • 9. पैरों की देखभाल पर विशेष ध्यान दें।

  • 10. आटोनामिक न्यूरोपैथी की भी जांच कराए। इन नियमों का पालन करने से डायबिटीज बीमारी के दुष्परिणामों का सामना मरीजों को नही करना पड़ता।


46. रमजान के समय खास सावधानी बरतने की जरूरत
डायबिटीज के वैसे मरीज जो रोजा रखते हैं उनके लिए रमजान के समय खास सावधानी बरतने की जरूरत है रमजान के समय खाने का समय बदल जाता है इसलिए इस समय खाने वाली ऐसी दवाएं लेनी चाहिए जो कम समय तक शरीर में कार्य करें। इस लिहाज से मेटाफारमीन एक अच्छी दवा है और यह फास्टींग के समय भी सुरक्षित है। यह जरुरी है कि दवा की मुख्य मात्रा सूर्यास्त के बाद वाले भोजन के बाद ली जाए एवं सुबह में दवा की बहुत हल्की मात्रा ली जाए। नई दवा रीपागलीनाइड भी रमजान के समय उपयोगी है। इसे खाने के तुरंत बाद लिया जा सकता है। अगर कोई मरीज ग्लीमीपराइड दवा पहले से ले रहा हो इसे सुबह के बजाय शाम में भोजन के बाद लेना चाहिए। जो मरीज इंसुलिन ले रहे हैं उन्हें भी मात्रा और समय बदल लेनी चाहिए। रमजान के समय इंसुलिन की पहले वाली मात्रा से कम लेने की जरुरत नहीं। बस समय बदल लेना चाहिए। इसका डोज शाम में लेना चाहिए।
47. किडनी फेल के मामलें को आप डायबिटीज में आसानी से टाल सकते हैं
डायबिटीज के वैसे मरीज जिनके पेशाब में अल्बूमीन जाता है या माईक्रल टेस्ट पाजीटीव आ जाता है वे काफी संशय में रहते हैं। ऐसा होना अक्सर आने वाले दिनों में किडनी की खराबी का संकेत देता है। इसे डायबिटीक नेफरोपैथी कहते हैं। टाइप टू डायबिटीज के ऐसे मरीजों को एंस इन्हीबीटर रेमीप्रील या एआरबी रिसेप्टर ब्लाकेज ग्रुप की दवा लोसारटन लेनी चाहिए। हर हाल में रक्त चार 130-80 से कम रखना चाहिए। इसके लिए दवा की चाहे कितनी मात्रा लेनी पड़े। इन दवाओं को लेने से सीरम क्रियेटीन की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है इससे घबराने की जरुरत नहीं। यह दवा किडनी को फेल होने से बचाती है। बस थोड़ी सतर्कता से किडनी फेल के मामलें को आप डायबिटीज में आसानी से टाल सकते हैं।
48. स्कूली बच्चे जगें,डायबिटीज रोकें
यह धारणा गलत है कि डायबिटीज से बचाव के उपाय 40 वर्ष के बाद करना चाहिए। वस्तुतः सच्चाई यह है कि स्कूल के दिनों से ही इसके बचाव के नियमों का पालन करना चाहिए। लगातार खानपान की गड़बड़ी और शारीरिक व्यायाम के अभाव में इंसुलिन की कमी होने लगती है कुछ बातों पर ध्यान देकर इस बीमारी से बचा जा सकता है। इसमें सबसे पहले फास्ट फूड का सेवन बंद करना चाहिए। इसके बाद डिब्बा बंद खाद्य पदार्थो का सेवन भी करना बंद कर देना चाहिए। साथ में मिठाई का भी नियमित सेवन बंद करे और उसके स्थान पर ताजे फल व अंकुरित अनाज का सेवन करें। साग सब्जी खूब खाएं ,नियमित व्यायाम करें। इसलिए स्कूलों को भी डायबिटीज से बचाव को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाना चाहिए।
49. सीरम क्रियेटीनीन 3 मिग्रा से ज्यादा हो तो मेटफारमिन दवा देना मना है
बहुत से डायबिटीज मरीजों का खाने के दो घंटे बाद का ब्लड शुगर ठीक रहता है मगर सुबह का फास्टिंग शुगर बढ़ जाता है। यह एक स्पेशल समस्या है। रात्रिकाल में लीवर द्वारा ज्यादा ग्लुकोज रक्त में भेजने से यह समस्या पैदा होती है। इसे हेपाटिक ग्लुकोज आउटपुट कहते हैं। ऐसे मरीजों को मेटफारमिन दवा से विशेष लाभ होता है। आजकल मेटफारमिन दवा डायबिटीज में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह हेप्टीक ग्लुकोज आउटपुट को कम करती है व इंसुलिन को संवेदनसील बनाती है। इस दवा को लेने के बाद ही खाना लेना चाहिए। यदि सीरम क्रियेटीनीन 3 मिग्रा से ज्यादा हो तो मेटफारमिन दवा देना मना है। कभी कभी इससे गैस की समस्या भी हो सकती है। तब दवा की डोज कम कर देना चाहिए।
50. छाती के सामने तेज दर्द,तुरत क्या करें?
यदि आपको छाती के सामने तेज दर्द होता है जो एक घण्टे से अधिक देर तक कायम रहता है व साथ में तेज पसीना आता है तो यह हृदयघात का संकेत है इस समय तत्काल एसपीरिन की एक गोली एक गिलास पानी में घोलकर पी लेना चाहिए। इससे मृत्यूदर में 23 प्रतिशत की कमी हो जाती है। यह समय बरबाद करने का नही है। डाक्टर को घर पर बुलाने में समय नष्ट नहीं करे। तुरंत अस्पताल पहुंचे। यदि छह घण्टे के अंदर थक्के को गलाने वाली दवा स्ट्रेपटोकाईनेज दे दी जाती है तो कोरोनरी नली में उत्पन्न थक्का जो हृदयघात करता है वह तुरंत गल जाता है। यह दवा छह घण्टे बाद देने से कारगर नहीं रहता। याद रखे जितनी जल्दी चिकित्सा शुरू होगी, जीवन रक्षा की सम्भावना भी उतनी ही रहेगी।
51. आज भी पेशाब में शुगर की जांच एक आसान और सस्ता तरीका
डायबिटीज में पेशाब की जांच द्वारा इसका नियंत्रण एक पुराना तरीका है। आज भी पेशाब में शुगर की जांच एक आसान और सस्ता तरीका है। कई मरीज सोचते हैं कि खून और पेशाब में शुगर दो अलग अलग चीजें हैं लेकिन ऐसा नहीं है। वस्तुतः यह किडनी की क्षमता पर निर्भर करता है। जैसे ही खून में शुगर की मात्रा 180 मिग्रा से बढ़ती है वैसे ही शुगर किडनी से छन कर पेशाब में आने लगती है। पहले बेनेडिक्ट घोल का प्रयोग कर मरीज घर पर पेशाब की मात्रा का निर्धारण करते थे। यह तरीका आज भी जनसुलभ है। बाजार में आजकल ग्लुकोस्टिक्स नाम से स्ट्रीप भी उपलब्ध है। जिनके पास ग्लुकोमीटर नहीं है वे ग्लुकोस्टिक्स से शुगर के नियंत्रण का जायजा ले सकते हैं।
51. अपना डाक्टर खुद बनें,फोन से बात करें
साधारणतः डायबिटीज में इंसुलिन की मात्रा का निर्धारण डाक्टर करते है और वही डोज मरीज को लेनी पड़ती है। यह फिक्सड डोज तरीका अब तक प्रचलित है। अब कई शोधों के बाद फ्लैसीबल डोज का कंसेप्ट दिया जा रहा है। इसके तहत मरीज स्वयं ग्लुकोमीटर में अपना ब्लड शुगर देखते हैं और स्वयं इंसुलिन की मात्रा कम या ज्यादा कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर फोन द्वारा अपने डाक्टर को फोन द्वारा सुचित करते हैं। यह तय किया जाता है कि जितनी मात्रा उन्होंने बढायी या घटायी है वह सही है। मरीज को सही चिकित्सा शिक्षा देकर उन्हें इस योग्य बना दिया जाता है कि थोड़ा बहुत इंसुलीन की मात्रा में हेर फेर करने से उन्हें फायदा हो। इस कंसेप्ट से मरीज को अपना ब्लड शुगर कंट्रोल करने में काफी मदद मिलती है।