डायबिटीज मरीज और सर्जरी


डायबिटीज के मरीजों में आपरेशन करने के पहले बहुत ज्यादा सतर्कता रखने की जरूरत पड़ती है। वैसे तो मुख्यतः मरीज के चिकित्सक का यह दायित्व है कि वह पूरी जांच-पड़ताल कर ले मगर तथ्यों से अवगत होना मरीजों के लिए भी आवश्यक माना जा रहा है।

एक शोध के अनुसार 80 के दशक में जितने भी आपरेशन होते थे, उनमें 11.3 प्रतिशत डायबिटीज के मरीज होते थे। डायबिटीज के कारण होनेवाले जो मुख्य आपरेशन हैं, उनमें आंखों की कुछ विशिष्ट बीमारियां, गुर्दा प्रत्यारोपण , नपुंसकता के लिए प्रोसथेसिस लगाना, पैरों का गैंग्रीन, कोरोनरी बाइपास, नसों आदि के लिए आपरेशन मुख्य हैं।

  • आपरेशन, शरीर में कुछ वैसे ही हालात पैदा करता है जैसा चोट लगने पर होता है। इन्सुलीन के कार्य को बाधित करनेवाले कई हारमोंस उत्पन्न हो जाते हैं। सामान्य मरीजों में तो इस असमान्य स्थिति का ज्यादा अंतर नहीं पड़ता मगर डायबिटीज के मरीजों में यह समस्या बन जाती है। कोई भी मेजर आपरेशन एवं जेनरल ऐनेसथेसिया डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा परेशानी और कई खतरनाक परिणामों को ला सकती हैं। इसके साथ ही मृत्युदर बढ़ने की भी संभावना रहती है।

  • मधुमेह के पुराने मरीजों में हृदय संबंधी, गुर्दा संबंधी, नस संबंधी और अन्य कई समस्याएं कुछ न कुछ विद्यमान रहती ही हैं। इसके कारण भी सामान्य ढंग से स्वास्थ्य लाभ में बाधा पहुंचती है। लेकिन आपरेशन के पहले खूब अच्छी तरह जांच-पड़ताल कर एवं ब्लडसुगर का नियंत्रण सही कर लिया जाये तो पाया गया है कि बहुत से दुष्परिणामों का मामला हो या बाईपास सर्जरी का, अब डायबिटीज के मरीजों में भी आसानी से और सफलतापूर्वक किये जा रहे हैं।

  • आपरेशन के पहले चिकित्सक कुछ खास जांच करते हैं। इसमें खासकर ब्लडसुगर की स्थिति, गुर्दे के सही होने की जांच, हृदय के फंक्शन का मूल्यन, इल्कट्रोलाइट की स्थिति आदि मुख्य हैं।

  • बहुत से मरीज आपरेशन के पहले खानेवाली दवाइयों पर अपना ब्लडसुगर नियंत्रित रखते हैं। आजकल कुछ नयी दवाओं के इस्तेमाल द्वारा आपरेशन के दो-तीन दिन पहले तक उनको उन्हीं दवाओं पर रखा जा सकता है।

  • आपरेशन के पहले ब्लडसुगर 100 से 160 मि.ग्रा. तक अपेक्षित माना जाता है मगर प्रीआपरेटिव और पोस्ट आपरेटिव पीरियड में इन्सुलीन का इस्तेमाल एकदम जरूरी हो जाता है। इन्सुलीन के इनफ्यूजन पम्प का इस्तेमाल कई बड़े केन्द्रों में किया जा रहा है मगर यह बहुत जरूरी नहीं है। आमतौर पर रैपिड एक्टिंग इन्सुलीन जो छह घण्टे तक ही असरदार रहता है, तीन बार चमड़े के नीचे दिया जाता है। आपरेशन का घाव सूखते ही धीरे-धीरे खानेवाली दवाओं का इस्तेमाल शुरू कर दिया जाता है।

आजकल गालब्लाडर स्टोन के लिए सर्जरी के अलावा ऐपेडिक्स, बच्चेदानी का आपरेशन जैसे आपरेशन भी लैपरोस्कोपिक विधि से किये जा रहे हैं। इसमें शरीर पर कम से कम आघात पहुंचता है। इस कारण डायबिटीज के रोगियों में इस विधि का प्रचलन भविष्य में पड़ने की सम्भावना है।

डायबिटीज के के मरीजों में आपरेशन की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन्सुलीन की मात्रा और ब्लडसुगर का नियंत्रण काफी गंभीरता से किया जाये। साथ में आपरेशन कक्ष पूर्णतः आधुनिक उपकरणों से लैस रहे ताकि इमरजेंसी की स्थिति से भली-भाँति निपटा जा सके। डायबिटीज के मरीजों को यदि आपरेशन की नौबत आती है तो बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। सही दिशा निदेर्शन में किये गये प्रयासों से वे अरामदेह जीवन व्यतीत कर सकते हैं।