मधुमेह और स्वास्थ्य शिक्षा

मधुमेह में स्वास्थ्य शिक्षा का औचित्य

अब भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या करीब 35 मिलियन होने जा रही है। मधुमेह की भयानकता इस तथ्य से जाहिर होती है कि ह्र्दय रोग, उच्च रक्त चाप, और स्ट्रोक का तो वह जनक है ही, अनियंत्रित अवस्था ह्र्दय, गुर्दे, आँखों और नसों की बरबादी ले आती है। तो ऐसे खतरनाक रोग के सबसे ज्यादा रोगी भारत में हैं और रहेंगे - आंकड़े यही संकेत दे रही है। अभी हम ऐसे जगह पर खड़े हैं जहाँ इसके ऐपेडेमिक रुप का विस्फोट अब हो ही चला है। अगर इस रोग को रोकना है, जो कि संभव लगता है तो उच्च प्राथमिकता के साथ इससे जुड़े सभी पहलुओं को समाज के हर वर्ग के व्यक्तियों तक पहुचँना होगा। मेडिसीन के मोटे ग्रंथों और डाक्टरों के आपसी सम्मेलन से निकल कर प्रमाणिंत हुए तथ्यों को जन-जन में पहुंचाने के लिए मधुमेह पर स्वास्थ्य शिक्षा की उपयोगिता के औचित्य पर आइए एक नजर डालें।


क्यों है मधुमेह ज्यादा भारत में?

पूरी दुनिया में जब मधुमेह की व्यापकता दर पर रिसर्च के नतीजे सामने आऐ तो यह बात सामने आयी कि जो भारतीय विदेशों में जा बसे और उनके जीवन में भौतिक सुख-सुविधा के कारण उनके रहन-सहन की शैली बदल गयी, उनमें मधुमेह की व्यापकतादर काफी ज्यादा बढ़ गयी। उनके रिश्तेदार जो भारत में ही रहे उनमें मधुमेह उस दर से व्यापक नहीं पाया गया। इस बात को समझा गया कि भारतीयों में जेनेटिक फैक्टर के कारण मधुमेह् होने की संभावना ज्यादा है मगर कुछ अन्य बातें अवश्य हैं जिसके कारण यह अंतर पाया गया। नवीनतम सर्वेक्षण जो मद्रास डायबिटीक सेंटर ने किए हैं, उनसे अति महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये हैं, जिसका जानना जन साधारण के लिए आवश्यक है। एक ही इथनिक समुदाय द्रवेडियन में किए गये सर्वेक्षण से पता चला कि मधुमेह की व्यापकता दर शहरी लोगों में 12 प्रतिशत है जबकि देहाती लोगों में मात्र 2.4 प्रतिशत। यह सर्वेक्षण यह बताता है कि विदेशों में जा बसे भारतीयों की तरह शहरी लोगों की बदली हुई जीवन शैली के कारण मधुमेह अपना चंगुल फैलाता जा रहा है। यह बदली हुई जीवनशैली है.

1. प्राकॄतिक भोजन से हटकर रिफाइन्ड फास्ट फूड पर रहना।
2. व्यायाम तथा शारीरिक मेहनत का अभाव।
3. फाइबर रहित भोजन को लेना।
4. मानसिक तनाव का ज्यादा होना।
5. मिठाईयों तथा चीनी का ज्यादा सेवन।
6. मोटापा आदि।

चीन देश में मधुमेह कम होने का कारण यह हो सकता है कि जेनेटिक रुप से उसमें होने की संभावना कम हो तथा उनकी जीवन शैली में पश्चिमी चाल का समावेश अभी कम है।

अगर मधुमेह रोग होने की पुरी प्रक्रिया पर नजर डाले तो यह पता चलता है कि वैसे लोग लोग जो जेनेटिक तौर पर रिस्क में आते है उसमें मधुमेह होने के पहले इमपेयरड ग्लूकोज टोलरेन्स की अवस्था आती है। इस समय ब्लड सुगर सामान्य से ज्यादा मगर डायबिटीक रेंज के नीचे रहता है (फास्टींग सुगर 126 मिलीग्राम से ज्यादा तथा पी पी सुगर 140 मिलीग्राम से ज्यादा मगर क्रमशः डायबेटिक रेंज 140 एवं 200 से कम).

एसे लोग कुछ सालों के बाद मधुमेह के रोगी हो जाते हैं। इस बात कि पूर्ण संभावना है कि समय पर उन्हें सही जानकारी देकर उन्के भोजन, शारीरिक व्यायाम आदि को ठीक कर दिया जाएँ तो मधुमेह की अवस्था को टाला जा सके। इस संदेश को व्यापक तौर से जन साधारण तक पहुँचाना स्वास्थ्य शिक्षा के मेलों को लगा कर ही संभव है।


उपचार के क्रम में

मधुमेह के उपचार के क्रम में पग पग पर स्वास्थ्य शिक्षा की जरुरत है। बिना जानकारी कि कदम कदम पर खतरों का सामना नहीं किया जा सकता। अगर सही ढंग से निर्देशों को समझा जाए तो एक मधुमेह के रोगी किसी भी सामान्य आदमी की तरह उन्मुक्त होकर जी सकता है। उपचार में सबसे महत्वपूर्ण धूरी स्वयं रोगी ही है।

चिकित्सक की भूमिका एक परार्मशदाता से ज्यादा कुछ नहीं। अपने चिकित्सक से 'डाएट चार्ट' अवश्य ले लें ऑर किस तरह फुड एकस्चेंज करना है, इसकी जानकारी हासिल करें। इससे एकरसता में बचा जा सकता है। शारीरिक मेहनत की क्या मर्यादा होगी इसका आकलन जरुरी है। अगर आप दवाओं को ले रहे हैं, या इन्सुलीन तो चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं की पूरी जानकारी रखनी होगी। दवा, भोजन और शारीरिक मेहनत तीनों को संतुलित कैसे रखा जाए यह समझना आवश्यक है। अगर संतुलन बिगडा तो बल्ड सुगर इतना कम या ज्यादा हो सकता है कि आप बेहोशी में चले जॉए और उपचार के आभाव में मौत आ जाए। खास कर बल्ड सुगर के कम होने के लक्षणों को जिसे हाइपोग्लायसिमिया कहते हैं, को समझना अवश्यक है। यह अवस्था जानलेवा है मगर उचित स्वास्थ्य-शिक्षा से इसे टाला जा सकता है।
मधुमेह के रोगी को हमेशा सावधान रहना पडता है इसके लिए कि बीमारी कंट्रोल में है या नहीं। कब मुत्र शर्करा की जॉच करनी है,कब ब्लड शुगर की जॉच होगी, आँखों की देखभाल, हॄदय और गुर्दों की देखभाल आदि के लिए स्वयं तत्पर रहना होगा। लम्बे समय तक चलनी वाली डी.सी.सी ट्रायल के नतीजे 1994 में उपलब्ध हो गये हैं। यू के प्रोसप्रेक्टिम ट्रायल टाइप टु डायबिटीज के नतीजे भी उपलब्ध हो गये हैं। दोनो ट्रायल बहरहाल संकेत दे रहे हैं कि मधुमेह में यदि ब्लड सुगर को नियंत्रित रखा जाए तो दूरगामी खतरनाक कमप्लीकेशनों को रोका जा सकता है। यह आवश्यक है कि महीने में कम से कम एक बार ब्लड सुगर की जांच कराकर डायबिटीज कन्ट्रोल का आकलन किया जाए। हर छह महीनें मे पेशाब में माइक्रो अलवुमिनुरिया कि जांच से किडनी की हालत का तथा फन्डोस्कोपी द्वारा आंखो की हालत का जायजा लिया जाय। समय समय पर ग्यायकोसेलेटेड हीमोग्लोबीन की जांच भी आवाश्यक है।

आजकल बहुत सी आयुर्वेदिक दवाओं का भरमार हो गया है। रिसर्च चल रहे हैं। जामुन के बीजों तथा मेथी का उपयोग वस्तुतः उपयोगी पाया गया है। करेला ज्यादा प्रभावकारी नहीं है। अच्छा यही होगा कि इन चीजों का उपयोग चिकित्सक की सलाह के बाद ही करें। खाने के तेलों के बारे में भी नई धारणा सामने आने वाली है। बाजार में हॄदय के लिए उपयोगी माने जाने वाली करडी आदि के तेलों पर प्रश्न चिन्ह उठाए गये हैं। क्योंकि एन-3 तथा एन-6 फैट की मात्रा संतुलित नहीं है जिसके कारण मधुमेह होने की सम्भावना बढ सकती है। सदियों से उपयोग में लाए गये सरसों तेल को ज्यादा गुणकारी पाया गया है। मछली का तेल और शुध्द घी के संतुलित उपयोग के गुणकारी प्रभाव की ओर नये संकेत मिल रहे हैं।

नोवोपेन-3 के उपल्बध होने के बाद इन्सुलीन लेना बहुत आसान हो गया है। ह्यूमन इन्सुलीन की गुणवत्ता असाधारण है। नयी दवाईयाँ दूरगामी कम्पलीकेशनों को रोकती है। आने वाले दिनों में आइजलेट ट्रान्सप्लान्टेशन संभव हो जाएगा। निराशा के दिन नहीं रहे, बस उचित जानकारी की जरुरत है।