इंसुलीन कितना जरुरी



ज़रूरत है जल्दी इंसुलीन लेना

इंसुलीन के इंजेक्शन का डर काफी व्यापक है। नई शोधों के अनुसार टाईप-2 मधुमेह के रोगियों को जल्दी इंसुलीन शुरु करनी चाहीए। इससे इंसुलीन को स्त्रावित करने वाले पैनक्रियाज के बिटासेल्स को नवजीवन मिलता है, और पुनः इंसुलीन स्त्रावित करने की क्षमता बढ़ जाती है। अगर आपका सुगर खाने वाली दवाइयों पर नियंत्रित नहीं रह रहा हो तो तीन से छह माह भी इंसुलीन लेने से काफी फायदा होता है।

यह जरुरी नहीं कि एक बार इंसुलीन की सुई शुरु की जाती है तो इसे जीवन भर लेना ही होगा। इंसुलीन शुरु करने पर मधुमेह के मरीजों में नई शक्ति आती है। उनको अपना स्वास्थ्य पहले से अच्छा जान पड़ता है। इंसुलीन का लेना ह्रदय के लिए भी अच्छा है।


भ्रमजालो का साया बहुत गहन है

इंसुलीन को लेकर डायबिटीज के मरीजों में तरह-तरह के भ्रमजालो का साया बहुत गहन है।

कई लोग यह सोचते हैं कि इंसुलीन की सूई लेने से बीमारी पूर्णतः साफ हो जायेगी। सच्चाई यह है कि बीमारी का पूरा क्योर कुछ नहीं है। इंसुलीन केवल ब्लडसुगर को नियंत्रित करता है। जरूरत के अनुसार इसको सदा के लिए या थोड़े समय तक दिया जाता है।

कुछ मरीजों को यह भय सताता है कि एक बार इंसुलीन की सूई शुरू हुई, इसका मतलब जिंदगी भर सूई लेने की विवशता हो जायेगी। खासकर टाइप टू डायबिटीज में कभी-कभी थोड़े समय तक इंसुलीन का देना काफी लाभकारी होता है।

बहुत से मरीजों में एक समय ऐसा आता है जब खानपान, व्यायाम एवं दवाइयों की पूरी मात्रा देने के बाद भी ब्लडसुगर काफी बढ़ा रहता है। ऐसे मरीजों में यदि तीन से छह महीने तक भी इंसुलीन की सूई दी जाये,तो पाया यह गया है कि दवाइयों का असर पुनः आ जाता है और ब्लडसुगर नियंत्रित रहने लगता है। इस तरह समझा जा सकता है कि शरीर में पैनक्रियाज की बीटा कोशिकाओं से जो इंसुलीन स्रावित हो जाता है, वह धीरे-धीरे घटता जाता है। बीटा कोशिकाएं निष्क्रिय हो जाती है या थकान से चूर-चूर हो जाती है। इस स्थिति में दवाइयों की कितनी भी मात्रा दें वह इन कोशिकाओं में इंसुलीन स्रावित नहीं कर पाता। इस स्थिति में यदि इंसुलीन की सूई शुरू की जाती है तो बीटा कोशिकाओं को अत्यंत आराम मिल जाता है और उनमें फिर से स्रावित करने की क्षमता पुनर्जीवित हो जाती है। यही कारण है कि तीन से छह महीने इंसुलीन देने के बाद यदि सूई बंद कर दी जाती है,तब दवाइयां पुनः प्रभावी हो जाती हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि यदि चिकित्सक आपको इंसुलीन की सूई शुरू करने की सलाह दे रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि जिंदगी भर आपको सूई लेनी ही है।

इंसुलीन को लेकर यह गलत धारणा भी लोगों को है कि खानपान पर नियंत्रण या व्यायाम की जरूरत नहीं है। सच्चाई यह है कि डायबिटीज के नियंत्रण में सबसे मत्वपूर्ण पायदान भोजन का नियंत्रण एवं व्यायाम ही है। इसके साथ इन्सुलीन की मात्रा निर्धारित की जाती है। व्यायाम के इतने ज्यादा गुण हैं जिसका कोई हिसाब नहीं है। इसलिए इन्सुलीन के साथ-साथ इन चीजों से पूर्णतः सतर्क रहना आवश्यक है। कभी-कभी इन्सुलीन शुरू करने पर धीरे-धीरे इसकी मात्रा लगातार बढ़ानी पड़ती है। मरीजों को तब यह डर हो जाता है कि उनकी बीमारी जरूरत से ज्यादा खराब हो गयी है। वस्तुतः ऐसी कोई बात नहीं होती। हर मरीज के शरीर का अपना अलग गणित होता है। किसी का सुगर इन्सुलीन की आठ यूनिट लेने से नियत्रित हो जाता है तो किसी में अस्सी या उससे ज्यादा की मात्रा देनी पड़ती है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है। शरीर में जितने इन्सुलीन की जरूरत है, उतनी देनी अतिआवश्यक होती है,

आजकल टाइप टू डायबिटीज में इन्सुलीन के साथ-साथ कुछ दवाइयों को देने का भी चलन है। बहुत से शोधों में इस कम्बाइंड ट्रीटमेंट की महत्ता सामने आई है। यही कारण है कि इन्सुलीन के साथ-साथ चिकित्सक कई बार कुछ दवाइयों को भी देते हैं। डीसीसीटी एवं यूकेपीडीएस ट्रायल ने यह बताया है कि ब्लडसुगर जितना नियंत्रित रहेगा डायबिटीज के दुष्परिणामों से उतना ही बचा जा सकेगा। बाजार में इन्सुलीन के की वैराइटी मौजूद हैं। बोभाइन, पोरसीन एवं ह्यूमन वैरायटी मौजूद हैं। ह्यूमन वैरायटी वोभान या पोरसीन से ज्यादा शुद्द एवं महंगी होती है। विकासशील देशों में बोभाइन एवं पोरसीन इन्सुलीन के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। इसका कारण मुख्यतः आर्थिक है। वैसे बोभाइन एवं पोरसीन इन्सुलीन भी सुरक्षित एवं असरदार है। इन्सुलीन कोई तिलिस्म नहीं है। यह तिलिस्म बैटिंग एवं चालर्स बेस्ट ने सन 1921 में इन्सुलीन की खोज करके तोड़ दिया था। तबसे अनगिनत लोगों के जीवन की रक्षा इन्सुलीन द्वारा हुई है। शरीर में वस्तुतः यही है असली सोना। इन्सुलीन को लेकर जो भरमजाल फैला है, वह मुख्य समस्या है। इसके कारम सही समय पर मरीजों की चिकित्सा नही हो पाती। बहुत आना-कानी के बाद ही मरीज इन्सुलीन लेने को राजी होते हैं मगर इन्सुलीन लेते ही उनमें नई ताजगी और उष्मा का संचार होता है। जरूरत इस बात की है कि इन्सुलीन को लेकर फैले भ्रमजाल को तोड़ा जाए।


बात बिगड़ने के पहले ही शुरु कर दें इंसुलीन।