मधुमेह और बच्चे


बच्चों में तेजी से बढ़ रहा डायबिटीज

हैरानी की बात है कि टाइप टू डायबिटीज जो मुख्यतः 40 साल की उम्र के आस-पास शुरू होता है, अब पीडियाट्रिक एज ग्रुप यानी 14 साल के नीचे के बच्चों में भी बहुतायत से मिल रहा है।


डायबिटीज मुख्यतः दो तरह का होता है। टाइप-1 एवं टाइप 2

टाइप-1 - मुख्यतः बच्चों में पाया जाता है इस बीमारी में पैनक्रियाज ग्रन्थि के बीटा सेल्स का पूणॆतः नाश हो जाता है जिसके कारण शरीर में इन्सुलीन की पूणॆतः कमी हो जाती है। ऐसा किसी आटोइम्युनिटी या अन्य कारणों से होता है। ऐसे मरीजों में इन्सुलीन की सुई देना ही इलाज का मुख्य पहलू है क्योंकि शरीर में इन्सुलीन का बनना सम्भव नहीं हो पाता। भारत में ऐसे मरीजों की संख्या पूरे डायबिटीज रोगियों का दो प्रतिशत होता है।
टाइप (2) डायबिटीज में बीटा सेल्स पूणॆतः नष्ट नहीं इन्सुलीन स्रावित करने की क्षमता में कमी हो जाती है।
टाइप (2)- डायबिटीज का बचपन में हो जाना एक अत्यन्त गम्भीर मसला है।
पूरे विश्व में इस विषय पर काफी बहस हो रही है। ऐसे रोगियों के लक्षण काफी क्लासिकल होते हैं, जैसे -

  • खूब पेशाबहोना,
  • खूब भूख लगना,
  • खूब प्यास लगना,
  • एवं कमजोरी महसूस करना।

       उम्र भले ही 10 साल की हो या 12 साल की, इन लक्षणों के आते ही तुरंत ब्लड सुगर जांच करानी चाहिए ताकि ऐसे मरीजों का इलाज जल्दी शुरू हो सके।


डायग्नोसिस करना आसान नहीं है

चिकित्सकों के लिए ऐसे मरीजों को डायग्नोसिस करना आसान नहीं है कि मरीज टाइप (1) का है या टाइप (2) का। इसके लिए सी पेपटाइड टेस्ट, इन्सुलिन की रक्तमात्रा एवं आटोएंटीबाडी टेस्ट की जरूरत होती है। ये काफी जटिल, महंगे एवं बड़े केंद्रों पर होने वाले टेस्ट हैं। मगर जब जरूरत हो तो कराना ही पड़ता है। पीडियाट्रिक एज ग्रुप यानी बच्चों या किशोरावस्था की देहली पर खड़े लोगों में टाइप (2) डायबिटीज के होने में हमारी बदलती जीवन शैली का मुख्य हाथ है। अमेरिका में बच्चों में मोटापा जो अस्सी के दशक में पांच प्रतिशत था, अब करीब 16 प्रतिशत बच्चों में पाया जाता है। मोटापा बढ़ने का मतलब है शरीर में बीटा सेल्स का लेप्टीन, एडिनोपेक्टीन एवं रेस्टीन जैसे प्रोटीनों का ज्यादा स्रावित होना। इससे इन्सुलीन के सही ढंग से स्रावित होने एवं सुचारू रूप से कायॆ करने में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इन्सुलीन का कम बनना या बनने के बाद भी नाकाम हो जाना ही डायबिटीज की अवस्था है।


मां-बाप एवं शिक्षकजन इस तथ्य को समझें

बच्चों में शारीरिक श्रम खेलकूद करने की दर काफी घटती जा रही है। टेलीवीजन देखने की दर काफी बढ़ चुकी है। एक शोध के अनुसार सामान्यतः बच्चे छह घंटे टीवी देखते हैं। उसके कारण मोटापा होने का रिस्क 23 प्रतिशत बढ़ जाता है और डायबिटीज होने का रिस्क चौदह प्रतिशत हो जाता है। यदि बच्चे एक घंटा रोजा खेलकूद में व्यतीत करें तो डायबिटीज से बचाव संभव है। दूसरा मुख्य कारण है बच्चों में ताजेफल, सब्जियों और पोषक खाद्य सामग्री के प्रति अरूचि, बदले में प्रत्येक दिन पेप्सी कोला, मैदे से बने खाद्य पदाथॆ, पिज्जा बरगर, फास्ट फूड, मिठाइयों का अत्यधिक सेवन। इन खाद्य सामग्री को खाने से शरीर में अत्यधिक फ्री रेडिक्लस (जहर) पैदा होते हैं जो बीटा सेल्स को धीरे-धीरे नष्ट करने लगते हैं। आंखों की खराबी, हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी फेल्यर, नशों की बीमारी जैसी समस्याएं जीवन की खुशियां खत्म कर देती हैं।




आवश्यकता इस बात की है कि मां-बाप एवं शिक्षकजन इस तथ्य को समझें और बच्चों को इस विषय पर शिक्षित करें।